728 x 90

अश्वेत फ्लॉयड की मौत: हिंसा में जलता अमेरिका, बंकर में राष्ट्रपति





इक्कीसवी सदी में नस्लवाद की ऐसी निर्मम घटना ने कोरोना संकट के मध्य में अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं| आधुनिक अमेरिका में ऐसी घटनाएँ अश्वेतों के समान अधिकारों पर आघात है, जिसे पाने के लिए सदियों तक अथक संघर्ष किया गया| पर क्या श्वेतों के जीवन का कोई महत्व नहीं? अमेरिका में हो रहे दंगे विदेशी नक्सलवाद का जीता जागता उदाहरण है|




hindiWorld/black-day-america.jpg

25 मई को अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में हुई मौत के विरोध में शुरू हुए देशव्यापी आंदोलन ने अमेरिकी प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। सभी 50 राज्यों में हो रहे प्रदर्शनों ने ऐसे समय में, जब देश और खासकर ट्रंप की कोरोना के मुद्दे पर गंभीर आलोचना हो रही है, विश्व के सबसे शक्तिशाली कहे जाने वाले व्यक्ति को बंकर में शरण लेने पर मजबूर कर दिया है। पूरा अमेरिका जॉर्ज के साथ हुए अत्याचार को अश्वेतों के साथ होने  वाले नस्लीय भेदभाव से जोड़ कर देख रहा है। कई विशिष्ट व्यक्तिगण जिनमें विभिन्न कंपनियों के शीर्ष अधिकारी भी शामिल है, इस मुद्दे पर अश्वेतों के साथ मजबूती से खड़े नजर आएँ हैं।

• शांति प्रदर्शन जब हिंसा में बदल गया

america-black-day.jpg

जहाँ एक ओर जॉर्ज  फ्लॉयड समेत पिछले कुछ वर्षों में हुई अन्य नस्लीय भेदभाव की घटनाओं के विरोध में बेहद शांतिपूर्वक प्रदर्शन हो रहे थे, समाज के कुछ आपराधिक तत्वों ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया। देखते ही देखते वॉशिंगटन, न्यूयॉर्क, शिकागो समेत लगभग 40 शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए। सरकारी वाहनों, इमारतों को नुक़सान पहुँचाया गया तथा पुलिस विभाग के अधिकारियों को भी निशाना बनाया गया। नतीजतन, सरकार को कठिन फैसले लेते हुए शांति बहाल करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स की मदद लेनी पड़ी। कई बड़े राज्यों को मजबूरन कर्फ़्यू तक घोषित करना पड़ा।

• हिंसा और तनाव से एंटीफा का संबंध

america-black-day.jpg

चित्र अवतरण श्रेय: न्यू यॉर्क टाइम्स

व्हाइट हाउस ने इस स्थिति के लिए एंटीफा समेत कई वामपंथी संगठनों को जिम्मेदार ठहराया है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने तो एंटिफा को एक आतंकवादी तक संस्था घोषित कर दिया है| एंटीफा फासीवादी ताकतों का विरोध करने वाला एक संगठन है जिनकी विचारधारा नस्लीय भेदभाव, उग्रवाद के ख़िलाफ़त में रही है। यूँ तो इस संगठन की कोई आधिकारिक पृष्ठभूमि नहीं है किन्तु जानकारों के अनुसार दूसरे विश्व युद्ध के उपरान्त नाज़ी विचारधारा के विरोध में सर्वप्रथम इसकी उपस्थिति के प्रमाण हैं| अमेरिका में एंटीफा की गतिविधि ट्रंप की 2016 में राष्ट्रपति चुनाव में जीत के बाद प्रमुखता से सामने आयी | 2017 में वर्जिनिया में हुई "यूनाइट द राइट" रैली इसका एक उदाहरण है|

इस पूरे घटनाक्रम में दो बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। अमेरिका के इतिहास में अब्राहम लिंकन से लेकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक कई बड़े नेताओं ने नस्लीय भेदभाव और खासकर अफ्रीकी मूल के अश्वेतों के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ निरंतर संघर्ष किया। किन्तु आज भी अनेक स्तर पर अमेरिका के संघीय ढांचे में नस्लीय भेदभाव से जुड़े दुर्भाग्यपूर्ण किस्से सामने आते ही रहते हैं। सैकड़ों वर्षों के संघर्ष के बाद भी ऐसी घटनाओं का आना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

‘’ यूँ तो तर्क दिया जा सकता है कि अमेरिका ने ही एक अश्वेत अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के ओबामा को दो बार चुनकर व्हाइट हाउस तक पहुँचाया, किन्तु इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि जॉर्ज फ्लॉयड के साथ हुई बर्बरता से ऐसे तर्क कमजोर पड़ते हैं। इसका दूसरा बिंदु और भी गंभीर है। जिन प्रदर्शनों का मकसद इस दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम का विरोध करते हुए सरकार और वहाँ के लोगों को पुलिस अफसर डेरेक जैसी सोच रखने वाले और रंगभेद का समर्थन करने वाले व्यक्तियों के प्रति जागरूक करना था, हिंसा की घटनाओं ने प्रमुख मुद्दे को नेपथ्य में सरका दिया है। सभी प्रमुख समाचार पत्रों तथा टीवी चैनलों पर केवल हिंसा ही चर्चा के केंद्र में है। ‘’

ट्रंप बेशक वामपंथी संगठनों के सर दोष मढ़कर, उन्हें आतंकवादी संगठन घोषित कर अपनी नाकामी छिपाने की कोशिश में लगे हों किन्तु कर्फ्यू, आगजनी, तोड़-फोड़ की घटनाओं ने ऐसे गंभीर विषय को, जिससे वास्तव में एक बदलाव की पगडंडी को मजबूत किया जा सकता था, कहीं ना कहीं कमजोर करने का कार्य किया है।

    • हमें सहयोग दीजिये
    • अगर आप चाहते हैं कि हम इसी तरह देश विदेश के मुद्दे उठाकर सच का साथ देते रहें, तो आप भी मदद कर सकते हैं। हमारे कर्म में श्रध्दा हो तो दान देकर हमें कृतार्थ करें।


Disclaimer

The views, information, or opinions expressed in the article by the authors are solely their own and do not represent the views of any organisation or entity the author have been, is now or will be affliated. The Present Mirror is an open platform and gives freedom to express all kinds of views and doesn't necessarily represent them. Present Mirror or its author will not be responsible for any errors that may have crept in inadvertently and do not accept any liability whatsoever, for any direct or consequential loss howsoever arising from any use of this publication or its contents or otherwise arising in connection herewith.



अनुशंसित पोस्ट

हाल की पोस्ट