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लाबी और कवि : छंद मुक्त -मुक्त के साथ लॉबी विमुक्त





जमाना कहां से कहां चला गया है और आप हैं कि पुरानी लीक को पकड़े बैठे हैं। हमें तो आज के साथ चलना है। देखते नहीं आजकल, गालिब, इकबाल, फ़ैज़, मजाज़ आदि की बातें कम, दुष्यंत, निदा फ़ाज़ली, नीरज,समीर,प्रसून आदि की अधिक करते हैं। कवि साहित्य और कला कैसे लॉबी की गुलाम है, सटीक चित्रण।




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कवि सम्मेलन का दृश्य- मंच पर कवियों का जमावड़ा । कभी कभी फुसफुसाते तो कभी करते -वाह...वाह..! कवि उवाच: में अज्ञान दास जी महाराज का नाम पुकारा जाता है। वे अपने कलफ़दार कुर्ते को सीधा करते हुए उठते हैं... तालियां बजती है, मगर आवाज़ में दम नहीं । दम भी कैसे हो, श्रोताओं का पंडाल में आधी से अधिक कुर्सियां खाली जो थी और जो लोग भी थे तो खाली कुर्सी को आगे कर उसपर पैर फैलाए ऊंघते, नींद लेते से.... सतपुड़ा के जंगल से ।

खैर अज्ञान दास जी महाराज अपनी कविता की पंक्ति सस्वर पढ़ते हैं और दुहराते हुए अपने साथ आए कवियों की ओर देखते हैं खासकर लालबुझक्कर की ओर। वह ऊंघता होता है। महाराज जी की कविता समाप्त होती है, दूसरे कवि मंच पर आते हैं। महाराज जी स्थान बना कर लालबुझक्कर के पास आ बैठते हैं और उसके कान में फुसफुसाते हैं - "क्यों ये ! तुमने मेरी कविता पर तो वाह...वाह.. नहीं किया, मगर बघेड़नाथ पर बड़ी वाहवाही दिखाई ।

लालबुझक्कर ने धीरे से कान में कहा - "आपकी कविता के समय थोड़ी झपकी आ गई थी महाराज और जहां तक उनकी कविता पर वाह..वाह की बात है तो मेरा धर्म बनता है। आखिर कवियों के लिए जब भी न्योता आता है तो वो मुझे भी साथ जो ले लेते हैं। ऐसे में वाह-वाह करना जरूरी था। किंतु अप्रत्यक्ष रूप से मन ही मन में -'एक ही तरह की सुनते-सुनते बोर हो गया हूं। 'बघेड़नाथ जी क्या.. बेधड़क जी क्या ...! सभी लॉबी वाले रीपीट कास्ट ही करते हैं "

अज्ञान दास जी महाराज को बुरा लगता है। वे चिढ़े स्वर में उससे कहते हैं - " ठीक है तो आगे से उन्हीं की लॉबी में शामिल हो जाना ।हम तो ठहरे छंद वाले और वे छंद मुक्त । छंद मुक्त करता... प्रगतिवादी , आधुनिक , तुकांत , अतुकान्त सभी लॉबी वाले 'नाथ जी ' के साथ चले जाना बड़का कवि बना देंगे ।"

लाल बुझक्कर ने देखा कि मामला गड़बड़ हो रहा है तो झट उनके चरण पकड़ लिया और कहा -" इसबार माफ़ कर दीजिए 'महाराज जी ' । अरे, आपकी लॉबी से बढ़कर कोई है । कोशिश करके थक गये कुछ लोग,मगर आपकी पूछ बरकरार की बरकरार है । आगे से दीदे मसल-मसल कर, पानी के छींटें मार-मार आँखे खुली रखूंगा और जोर-शोर से वाह..! वाह..!! करूंगा। बस अब गुस्सा थूक दीजिए । "

किंतु मन में तो था -' जमाना कहां से कहां चला गया है और आप हैं कि पुरानी लीक को पकड़े बैठे हैं। हमें तो आज के साथ चलना है। देखते नहीं आजकल, गालिब, इकबाल, फ़ैज़, मजाज़ आदि की बातें कम, दुष्यंत, निदा फ़ाज़ली, नीरज,समीर,प्रसून आदि की अधिक करते हैं । अब चांद गोरी गोरी के चेहरे में और सावन उसकी जुल्फों में अधिक दिखते हैं। और ये हैं कि...।"

तभी शोर मचने लगता है...वह आ गई...वह आ गई... चलो... चलो ... वह आ गई । लोग भागते हैं , पंडाल खाली हो जाता है । यहां तक कि आयोजक के कार्यकर्ता भी बहानेबाजी कर भाग खड़े होते हैं। और थोड़ी ही देर में डी.जे. पर आवाजें आनी शुरू हो जाती है... मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए...।

लाल बुझक्कर मंच पर बैठे कवियों की ओर देखता है और धीरे से उतर कर बहाना बनाते हुए निकल गया। थोड़ी देर बाद वह भी डांस लॉबी का हिस्सा बन चुका था.. छंद मुक्त -मुक्त छंद मुक्त के साथ लॉबी विमुक्त...।

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