728 x 90

भीष्म और परशुराम के युद्ध पर होने वाला दुष्प्रचार देश को बाँटने का षड़यंत्र है|

  • अन्य
  • मृतुन्जय पांडे | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: May 3, 2020, 6:47 a.m.




एक वर्ग ने भीष्म और परशुराम के युद्ध पर फिर से इस देश को जातिओं में बांटने का षड्यंत्र किया है| भीष्म-परशुराम युद्ध का ये विश्लेषण सिर्फ सत्य पर निहित है| जिसमें सभी तथ्य उद्योग पर्व के अन्तर्गत अंबोपख्यान पर्व में भीष्म और परशुराम युद्ध से हैं|




hindiOther/MAHABHARAT.jpg

भीष्म पितामह और भगवान परशुराम के युद्ध का महर्षि वेदव्यास रचित महान महा काव्य महाभारत में विस्तार से वर्णन है| भीष्म पितामह ने अंबा को स्वयंवर में जीत कर हरण करने के पश्चात अपने क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध जाकर अंबा से विवाह नहीं किया था| तब लाचार अंबा अपनी प्रार्थना लेकर भृगुवंश शिरोमणि नारायण आवेशवतार (व्याख्यान चित्र नम्बर 7) परशुराम जी के पास गई थीं| भगवान परशुराम ने अपने शिष्य भीष्म पितामह को अंबा से विवाह कर अपना क्षत्रिय धर्म निभाने का संकेत दिया, लेकिन प्रतिज्ञा से बंधे भीष्म पितामह इसे न मान सके| जिसके फलस्वरूप आरंभ हुआ भीष्म और परशुराम के बीच धर्मोच्चित महासंग्राम, जो 23 दिनों तक चला|

इस युद्ध में आखिर कौन विजित हुआ था और कौन पराजित, ऐसे प्रश्न कोई संकुचित सोच का व्यक्ति ही उठा सकता है| अंबोपख्यान पर्व के 179वे अध्याय में लिखा है कि स्वयं भीष्म पितामह अपने गुरु के चरण स्पर्श करने जाते हैं| ये संदर्भ जो लोगो के लिए प्रेरणा होनी चाहिए वो दुर्भाग्यवश कुंठित मानसिकता का परिचायक बन गया है|

युद्ध बिभिन्न चरणों में होता है|

परशुराम जी ने युद्ध के प्रारंभ में ही भीष्म पितामह को अपने बाहुबल से हरा दिया था, जैसा की निम्न दिए श्लोकों में वर्णित है| जिसके बाद उनके वसु भाई, उनकी माता गंगा के साथ ब्राह्मण का रूप धरकर उन्हें बचाने पहुंचे थे, जो आप चित्र नंबर 2 और 3 में पढ़ सकते हैं| यह प्रसंग उद्योग पर्व के अन्तर्गत अंबोपख्यान पर्व के 182वे अध्याय से है| और फिर स्वयं भीष्म पितामह स्वीकार करते हैं कि महाबली परशुराम से उनका जितना संभव नहीं| ये भीष्म पितामह की महानता थी|

bhisma-parshuram-book-part1.jpg
श्रोत : अंबोपख्यान पर्व, महाभारत

तब भीष्म पितामह को उनके वसु भाईयो ने उन्हें अमोघ प्रस्प्वापनास्त्र अस्त्र दिया था, जो आप 4 और 5 नंबर चित्र में पढ़ सकते हैं| ये अस्त्र ब्रह्मशिर की भांति प्रबल था और श्रृष्टि का विनाश कर सकता था| भीष्म क्षत्रिय धर्म से बंधे थे| भगवान परशुराम अम्बा के वचन से बंधे थे| देवताओं और परशुराम के पितरों ने इस विनाश को रोकने के लिए दोनों योद्धाओं से विनती की| परन्तु दोनों ही नहीं माने उसके पश्चात स्वयं भीष्म पितामह की माता ने परशुराम जी से अपने शस्त्र छोड़ने की प्रार्थना की जिसके पश्चात भृगुनंदन नारायण अवतार परशुराम जी ने अपने शस्त्र छोड़ दिए| ये प्रसंग आप चित्र नंबर 6 में पढ़ सकते हैं| ये भगवान परशुराम की महानता थी|

bhisma-parshuram-book-part2.jpg
श्रोत : अंबोपख्यान पर्व, महाभारत

भीष्म पितामह चित्र नम्बर 4 में क्यों कहते हैं कि वो विप्रवर परशुराम से जीत नहीं सकते? फिर चित्र नम्बर 7 में भगवान परशुराम अम्बा को क्यों कहते हैं की वो भीष्म से जीत नहीं सकते? जय पराजय में इस युद्ध को तौलने वाले कभी सनातन सभ्यता की गुरु-शिष्य परम्परा को नहीं समझे| घटिया प्रवृति के लोग इसमें ब्राह्मण क्षत्रिय के बीच फुट डालने का अवसर तलाश रहे हैं पर सनातन का जोड़ इतना कमजोर नहीं है| महर्षि वेदव्यास ने जब इस प्रसंग की व्याख्या की तब उनका आशय क्या ऐसी दुष्प्रचारित मानसिकता होगी? वो गुरु शिष्य के अनन्य प्रेम को दर्शा रहे थे|

bhisma-parshuram-book-part3.jpg
श्रोत : वन पर्व, अंबोपख्यान पर्व, महाभारत

भगवान परशुराम और भीष्म पितामह के बीच का युद्ध, गुरु और शिष्य के बीच का युद्ध था। आजतक सनातन इतिहास में कहीं भी गुरु से शिष्य श्रेष्ठता नहीं दिखाता। शिष्य हमेशा गुरु का आदर करता है। युद्ध भी गुरु की आज्ञा से करता है| अर्जुन ने भी गुरु द्रोणाचार्य की आज्ञा लेकर ही उनपर शस्त्र उठाये| यही हमारी संस्कृति है।

परशुराम ने अम्बा को वचन दिया था, भीष्म भी अपनी गुरु की आज्ञा से ही लड़े। इसमें श्रेष्ठता ढूढंने वाले उसी कुचक्र कुविचार का शिकार हैं, जिसने सनातन सभ्यता को चोट पहुँचाई है। गुरु शिष्य को शिक्षा ही इसलिए देता है क्योंकि शिष्य एक दिन गुरु से भी श्रेष्ठ और निपुण बने। एक गुरु के लिए वो सबसे आनंद-विभोर पल होता है।

सिर्फ विकारों से शिकार व्यक्ति ही इसमें प्रतियोगीता ढूंढ़ सकता है। धिक्कार है ऐसे लोगों पर, जो सनातन संस्कृति की एकता के शल्य बने बैठे हैं। धिक्कार है| भीष्म पितामह एक महान प्रतिज्ञनिष्ठ वसु, अपना धर्म निभा रहे थे तो वहीँ भगवान परशुराम स्वयंभु नारायण अवतार, अपनी लीला में मग्न थे| भीष्म परशुराम युद्ध में श्रेष्ठ बस भारतवर्ष की युग युगांतर से चली आ रही गुरु शिष्य की परम्परा है|

    • हमें सहयोग दीजिये
    • अगर आप चाहते हैं कि हम इसी तरह देश विदेश के मुद्दे उठाकर सच का साथ देते रहें, तो आप भी मदद कर सकते हैं। हमारे कर्म में श्रध्दा हो तो दान देकर हमें कृतार्थ करें।


Disclaimer

The views, information, or opinions expressed in the article by the authors are solely their own and do not represent the views of any organisation or entity the author have been, is now or will be affliated. The Present Mirror is an open platform and gives freedom to express all kinds of views and doesn't necessarily represent them. Present Mirror or its author will not be responsible for any errors that may have crept in inadvertently and do not accept any liability whatsoever, for any direct or consequential loss howsoever arising from any use of this publication or its contents or otherwise arising in connection herewith.