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विश्व नारी दिवस : नर और नारी एक दुसरे के पूरक, एक नारीत्व ऐसा भी

  • अभिमत
  • आकांक्षा ओझा | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: March 8, 2021, 5:33 p.m.




पाश्चात्य सभ्यता के रंग में डूबे, स्वयं को पुरूष से श्रेष्ठ साबित करने की होड़ और द्वंद्व ने समाज और स्त्री दोनों को ही पतित कर दिया। नहीं तो ऐसा क्या हो गया कि यत्र नार्यस्तु रमन्ते तत्र देवता और जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गाद्यापी गरीयसी की भूमि को पितृसत्तात्मक कह दिया जाता है? स्त्री और पुरुष दोनों समाज की एक धुरी हैं, दंभ में आकर समूल नष्ट न करें।




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आज नारी दिवस के दिन कई लोग यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः दोहराते दिख जायेंगें और तत्पश्चात जिस मनुस्मृति का यह श्लोक है उसी मनुस्मृति को पितृसत्तात्मक स्त्री विरोधी बोल प्रवंचना करते भी नजर आयेंगें। "नारी तू नारायणी" श्रृषि मुनियों के आर्यावर्त की इस भूमि पर आखिर क्यों जरूरत पड़ गयी इस पाश्चात्य नारी दिवस की जहाँ नारी सदा सर्वदा से सम्मानित रही है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। मनुस्मृति ३/५६ ।।


जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। मनुस्मृति ३/५७ ।।


जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।

स्त्री का सतीत्व और उर्जा उस काल में इतनी ओजस्वित और तेजमयी हुआ करती थी कि वह स्वत: और स्वयमेव ही पूजित थी। नारायण अवतार प्रभु श्री राम से पहले जनक दुलारी सिया की जयकार होती थी। प्रभु श्रीकृष्ण से पहले राधे को स्मरण किया जाता था। क्षत्रिय कुलवंत्सं छत्रपति के शौर्य का श्रेय भी माता जीजाबाई को दिया जाता था। क्योंकि यह स्त्रीयां स्त्रैणता के गुणों की पराकाष्ठा हैं, त्याग मयी रही हैं, परिवार हित के लिए वामभागी बन समस्त भोग विलास का परित्याग कर सहचरी रही हैं।

इसलिए यह स्त्रीयां देवी तुल्य हैं। फिर आज यह असामनता की उपज कहाँ से आ गयी?

पाश्चात्य सभ्यता के रंग में डूबे, स्वयं को पुरूष से श्रेष्ठ साबित करने की होड़ और द्वंद्व ने समाज और स्त्री दोनों को ही पतित कर दिया। स्त्री और पुरूष की शारीरिक संरचना का निर्माण जब प्रकृति ने स्वयं पृथक हो कर उनके कार्यक्षेत्र और कार्यक्षमता को निर्धारित किया तो आपको प्रकृति और विपरीत लिंगी से ही प्रतिद्वंद्विता कर पितृसत्तात्मक संरक्षण को गाली क्यों देनी है?

आप स्वयं अपने स्त्रीत्व के गुणों को सजा, संवार और निखार क्यों नही सकतीं। आपका पहचान बोध आपकी कार्यकुशलता पर निर्भर करता है न कि आपके लिंग पर।

इसके लिए पुरूष को अपराधबोध ग्रसित करना बंद करें। आपको मासिकधर्म में आफिस में बैठकर काम करने के बावजूद Period leaves चाहिए और पीरियड के दौरान मंदिर भी जाना है जो कि सर्वथा वर्जित है, इसके बाद भी आप Equal wage and Pay की बात करेंगी? क्या ये न्ययोच्चित है?


आपको लगता है कि रसोई और गृहकार्य आपके ऊपर थोपी गयी पितृसत्ता की प्रताड़ना है और फिर आपको स्वयं की तुलना देवी से करनी है।
सम्मान दोगलापन से अर्जित नही किया जा सकता यह ज्ञातव्य रहे। पुरूष को भावनाशून्य के सांचें में ढालना भी बंद करें। पुरूष भी उतना ही भावुक होता है जितना की आप, वरन आपसे भी ज्यादा। पर घर परिवार को सुचारु रुप से चलाना उसका पुरुषार्थ है।
और अपेक्षाओं पर खरा ना उतरने पर पुरूष भी प्रताड़ित किये जाते हैं। दहेज लोभी और दहेज प्रताड़ना के ऐसे हजारों झूठे केस न्यायालय में लंबित हैं। दोहरे मापदंड का चश्मा उतार कर भी देखिए एकबार।

मेरे पिताजी की मैं पहली संतान हूँ, जितना मेरी मां भावनाएं प्रकट कर लेती हैं, शायद पापा न कर पायें, पर मुझे भली भाँति भान है इसका कि वो अत्यधिक भावुक थे मुझे लेकर। कालेज-होस्टल तक भेजने में मुझे वह द्रवित हो उठते थे। जॉब से लौटने में अगर रात हो रही हो तो मम्मी के निरंतर फोन कॉल और उसके पीछे पिताजी की भी चिंता। उनके कंधे पर परिवार को सुख वैभव देकर आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने की जिम्मेदारी थी। हमारे आँख खोलने से पहले वह घर से निकल जाते और देर रात ही लौटते, फिर भी आकर दोनों भाई बहन को एक थपकी जरूर देते और माँ से हमारे दिनभर के क्रियाकलाप का वृतान्त सुना करते।

माँ ने भी शिक्षित होने के बावजूद घर परिवार को वरीयता दी और हमारी हर जरूरतों का ख्याल रखा ताकी पापा घर की तरफ से निश्चिंत रहें। वह सदैव उनकी अर्धांगिनी धर्म का पालन करती रहीं इसलिए मैं दोनों का योगदान बराबर मानती हूं, कम ज्यादा नहीं।

यह वर्चस्व और अधिकार की लड़ाई है ही नही, दंभ में आकर समूल नष्ट न करें। घर परिवार और समाज की धुरी दोनों ही स्त्री पुरुष होते हैं इसलिए वह स्वावलंबी नहीं एक दूसरे पर निर्भर हैं।

पिता और पति का पुरूषार्थ पत्नी और बच्चों का लालन पालन है और पत्नी और मां का स्त्रीत्व पति द्वारा अर्जित धन को सहेजना और अपने घर को संवारकर बच्चो में संस्कार और वैचारिक मूल्यों का समावेश करना है।

ऐसा ही परिवार भारतीय मूल्यों को परिभाषित और परिलक्षित करता है। #HappyWomen’sDay

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