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कोरोना महामारी में रवीश जी, चित भी आपकी, पट भी आपकी, कैसे करते हैं?

  • अभिमत
  • अदिति शर्मा | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: April 19, 2020, 6:54 a.m.




हर पैरेग्राफ के साथ लगता है जैसे बोला जाए, "का मर्दे ? तोहार दिक्कत का हव ?" कोरोना टास्क फ़ोर्स का लाइव सेशन नहीं था कि डीटेलिंग की जाती। जिस देश का इलीट भी क्वारंटायिन होने से भाग रहा हो, उस देश के जनमानस की नब्ज़ पकड़ना ना आप कभी जान पाए, ना आप जान पाएंगे। आप ये कैसे करते हैं, नहीं पता| पर आप ये करते रहते हैं, नियमित, निरंतर, नादान बालक की भांति|




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चित्रण सौजन्य: द प्रिंट

रवीश कुमार जी ने अपने निजी लेख में लिखा है, “राहुल कुलकर्णी को मोहरा न बनाएँ। छोड़ दें। खबरों में मानवीय चूक हो सकती है। उसकी सजा जेल नहीं है। इस खबर में तो राहुल ने ऐसा कुछ नहीं किया”।

रवीश जी की एक बार बात मान भी ली जाए, कि झूठी ख़बरों के लिए जर्नलिस्ट को बली का बकरा बनाना अनुचित है| पर फिर यही रवीश बाबु हैं, जो गोदी मीडिया का रोना दिन में 5 बार नियमित रूप से रोते हैं| मैं बताती चलूँ, ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि स्त्री होने के नाते रोने का कॉपीराइट सिर्फ हमारे पास है| पता लगा कल को फिर रो दिए कि पत्रकारों के रोने के हक को छीन लिया, इस फासीवाद सरकार ने| खैर|

ये वही रवीश कुमार हैं, जो जनता को रामायण न देखने के लिए उकसाते हैं| और फिर प्राइम टाइम करते हैं कि देश में साम्प्रदायिकता बहुत बढ़ गयी है| डर का माहौल है जी| ये वही रविश कुमार हैं, जिन्होंने अपने एक लेख में कई महत्वपूर्ण जानकारियों के सहित, वो हर दूसरी सांस के साथ ये पूछ रहे हैं, “ प्रधानमंत्री मोदी ने जनता को थाली और ताली बजाने के लिए तो बोल दिया, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का क्या स्टेटस है अभी के हालात से निबटने के लिए, ये उस संबोधन में क्यों नहीं बताया। और थाली पीटने को उत्साहित जनता उनसे ये सवाल क्यों नहीं पूछ रही”।

रवीश जी, लड़कियां इतना अपने मूड स्विंग वाले फेज़ में भसड़ नहीं करतीं जितना आप बिना किसी क्रैम्प के करते हैं, हर पैरेग्राफ के साथ लगता है जैसे बोला जाए, "का मर्दे? तोहार दिक्कत का हव?" आप सरकार से प्रश्न पूछें, बेशक| गलतियां करने से उन्हें बचाएं, बिल्कुल। पर वो देश के नाम संबोधन था, जन संबोधन याने कि मास अपील का तत्व ही साधारण और असरदार होना है| बजट नहीं पेश हो रहा था कि बताएं हेल्थ मिनिस्ट्री को कितना पैसा अलोकेट किये हैं, कैबिनेट कमेटी की बैठक नहीं थी कि रिलीफ फंड पर चर्चा हो, कोरोना टास्क फ़ोर्स का लाइव सेशन नहीं था कि डीटेलिंग की जाती।

जिस देश का इलीट भी क्वारंटायिन होने से भाग रहा हो, उस देश के जनमानस की नब्ज़ पकड़ना ना आप कभी जान पाए, ना आप जान पाएंगे। तभी आज तक कौन जात हो, पूछ पूछकर जातिवाद से लड़ रहे हैं। और प्रश्न पूछने के लिए आपकी बिरादरी है ना, आपके पास हमसे अधिक जानकारी है ना, पूछिये ना प्रश्न, कि आप सोचते हैं फूलपुर गांव के छोटके चाचा मोदी जी को ट्वीट करके गरियाएंगे? प्रश्न पूछने और थाली बजाने में, या कि ताली बजाने के लिए कहने और टेस्टिंग लैब्स उपलब्ध कराने में विरोधाभास कहाँ है? जब है नहीं, तो आप उत्पन्न क्यों कर रहे हैं?

इंस्टाग्राम पर नीली स्टोरी डालने से क्या सुदान की गरीबी दूर हो गई थी? मोमबत्ती की प्रोफाइल पिक्चर लगाकर क्या पाकिस्तान में आतंकवादी हमले में मरे बच्चे जीवित हो गए थे? या  #YesIBleed  के कैम्पेन के बाद आपके दिमाग में व्याप्त तथाकथित ब्राह्मणवाद की समस्या खत्म हो गई? अपनी हिचक, अज्ञानता, अल्पज्ञता, कुंठा अथवा हीन भावना को कूल बनकर आप चाहें भी तो छुपा नहीं सकते। जनहित की चिंता है तो उन लोगों को ज़रूर जागरूक करें, पर बाकी सबपर, इस पहल पर निशाना साध के नहीं, क्योंकि, अगर आप प्रतीकात्मक पहल को समझने में असमर्थ हैं, तो महोदय, चुटकुला आप स्वयं को बना रहे हैं|

रवीश जी, आप सही कहते हैं, “छोड़ दें”| पत्रकार रायता पर रायता फैलायें और हम छोड़ दें| रेस्नालिटी कब स्केपटिसिज्म में बदल जाती है और स्केप्तिक होते होते आप कब बौरा जाते हैं, आपको पता भी नहीं चलता। आगामी दिनों में लौकडाउन बढ़ सकता है, थोड़ा सा डीसईंफेक्टंत अपने कुंठा रूपी वायरस पर छिड़कें और योग कर मानसिक संतुलन बनाए रखें। हम जानते हैं आप ज्ञानी हैं। हमें आपकी फ़िक्र है| आप जनता को गुमराह भी करें और हम छोड़ भी दें, भई वाह! रवीश जी, चित भी आपकी, पट भी आपकी, आप ये कैसे करते हैं, नहीं पता| कोरोना जैसी महामारी में भी आप ये करते रहते हैं, नियमित, निरंतर, नादान बालक की भांति|

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