728 x 90

रहमत अली : कौन था बँटवारे और पाकिस्तान का असली मास्टरमाइंड?

  • अभिमत
  • अपरिपक्व बालिका | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: March 4, 2021, 9:55 p.m.




रहमत अली ने लिखा था कि यह धारणा ‘एक सफेद झूठ’ है कि भारत एक राष्ट्र है। उसने नारा दिया कि उत्तर-पश्चिम भारत के उन प्रांतों-पंजाब, कश्मीर, सिंध, सीमा प्रांत और बलूचिस्तान—को मिलाकर, जहाँ मुसलमानों का बहुल है, एक मुस्लिम राष्ट्र का निर्माण किया जाए। उन्होंने कसम खाई थी—‘हम हिंदुस्तान को बँटवा देंगे या फिर हिंदुस्तान को तबाह कर देंगे?' अचानक भारत के सामने गृहयुद्ध का वही भयानक दृश्य उभरने लगा जिससे दुखी होकर गाँधी नोआखाली के जंगलों में भटक रहे थे।




hindi/lahore-resolution-3-og.jpg

यह विचार कि, भारत के मुसलमान अलग अपने राज्य की स्थापना करें, पहली बार कैंब्रिज में नं 3 हंबर्स्टन रोड पर एक मामूली-से अंग्रेज़ बंगले में टाइप करने के काग़ज़ के साढ़े चार पन्नों पर औपचारिक रूप से प्रतिपादित किया गया था। इस विचार का प्रणेता एक चालीस वर्षीय भारतीय मुस्लिम ग्रेजुएट छात्र था, जिसका नाम था रहमत अली; उसके इस सुझाव के ऊपर 28 जनवरी, 1933 की तारीख पड़ी हुई थी।

रहमत अली ने अपने इस नये राज्य के लिए एक नाम भी सुझाया था। जिन प्रांतों को मिलाकर यह राज्य बनाया जाने वाला था उनके नामों के आधार पर, उसने नफरत की इस कड़ी का नाम रखा था ‘पाकिस्तान’ अर्थात पवित्र भूमि।

उसने एक अनुपयुक्त परंतु जोशीली उपमा देते हुए अपने इस सुझाव के अंत में लिखा, “हम हिंदू राष्ट्रवाद की सूली पर अपने प्राण देने को तैयार नहीं हैं।”

Now-Or-Never चित्र फाइल: रहमत अली की किताब का पहला पन्ना

तीसरे गोलमेज सम्मेलन के बाद भारतीय संवैधानिक सुधारों के लिए एक संसदीय समिति बनी थी जिसमें ब्रिटेन और भारत दोनों के प्रतिनिधि थे। इन प्रतिनिधियों को 1933 में एक पर्चा मिला जिसका शीर्षक था - अभी नहीं तो कभी नहीं - क्या हम जीवित बचेंगे या हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएँगे? (Now or Never - Are we to live or perish forever?)। यह पर्चा चौधरी रहमत अली ने लिखा था जो उन दिनों लंदन में क़ानून की पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने उसपर तीन अन्य लोगों के भी हस्ताक्षर ले लिए थे ताकि यह न लगे कि ये बातें केवल एक अकेले व्यक्ति की दिमाग़ी उपज है। पाकिस्तान (उस समय पाकस्तान) शब्द का पहली बार इसी पर्चे में इस्तेमाल हुआ था। पर्चे के साथ एक चिट्ठी भी थी जिसमें लिखा था-

‘भारत के इतिहास की इस पावन घड़ी में, जब ब्रिटेन और भारत के राजनेता इस देश के संघीय संविधान की बुनियाद रखने जा रहे हैं, हम यह अपील कर रहे हैं, हमारी साझा विरासत के नाम पर, हमारे 3 करोड़ मुसलिम भाइयों की तरफ़ से जो पाकस्तान में रहते हैं - (पाकस्तान से) हमारा मतलब है भारत की पाँच उत्तरी इकाइयाँ यानी पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (अफ़ग़ान प्रांत), कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान। (ध्यान दीजिए, पर्चे में जो नाम दिया गया था, वह पाकस्तान था, पाकिस्तान नहीं)।’

जब मुस्लिम लीग ने, जिसमें सारी मुस्लिम राष्ट्रवादी आकांक्षाएँ केंद्रित थीं, रहमत अली के इस सुझाव को अपना लिया, तो धीरे-धीरे वह भारत के मुस्लिम जन-साधारण के मन में भी बैठता गया। कांग्रेस के उन बहुसंख्यक हिंदू नेताओं के अँधे राष्ट्रवादी रवैये के कारण, जो अपने मुस्लिम शत्रुओं के साथ किसी तरह की रिआयत करने को तैयार नहीं थे, यह सुझाव फूलता-फलता रहा।

वह घटना जिसने भारत के हिंदू और मुस्लिम संप्रदायों की प्रतिद्वंद्विता को बड़ी तेजी से हिंसा में परिवर्तित कर दिया, 16 अगस्त, 1946 को घटी थी, उससे ठीक पाँच महीने पहले जब महात्मा गाँधी ने अपनी यह प्रायश्चित-यात्रा आरंभ की थी। घटनास्थल था ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर कलकत्ता, जो हिंसा और बर्बरता के मामले में अपनी ख्याति के लिए बेजोड़ था। कलकत्ता, जिसके ‘ब्लैक होल’ कांड की चर्चा चारों ओर थी, अंग्रेजों की कई पीढ़ियों के लिए भारतीय क्रूरता का पर्याय रह चुका था।

कलकत्ता के एक निवासी ने एक बार कहा था कि कलकत्ता की गंदी बस्तियों में किसी अछूत के घर पैदा होना ही नरक है। इन गंदी बस्तियों की आबादी जितनी धनी थी, उतनी दुनिया में और कहीं नहीं थी; ये बस्तियाँ ऐसी विपदाओं के गंदे बदबूदार धब्बे थीं, जिनकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती। हिंदू और मुस्लिम टोले बिना किसी तर्क या योजना के एक-दूसरे में गुंथे हुए थे।

16 अगस्त को बहुत सबेरे ही मुसलमानों की भीड़ें धार्मिक उन्माद से चीखती हुई अपनी गंदी बस्तियों से निकल पड़ी थीं। सभी के हाथों में लाठियाँ, लोहे की छड़ें, बेलचे या कोई-न-कोई ऐसा हथियार जरूर था जिससे किसी इंसान की खोपड़ी खोली जा सके। ये लोग मुस्लिम लीग की इस ललकार पर सड़कों पर निकल आये थे कि 16 अगस्त को ‘सीधी कार्रवाई का दिन’ मनाया जाए, ताकि अंग्रेज़ों और कांग्रेस पर यह साबित किया जा सके कि भारत के मुसलमान इस बात के लिए तैयार हैं कि ‘अगर जरूरी हो तो वे ‘सीधी कार्रवाई’ से भी अपने लिए पाकिस्तान हासिल कर लें।”

hindupalayan फाइल चित्र: नोअखली दंगो में हिन्दू परिवारों का पलायन

उन्हें रास्ते में जो भी हिंदू मिलता उसका वे बड़ी बर्बरता से वहीं मौत के घाट उतार देते और लाश शहर की खुली नालियों में फेंक देते। भयभीत पुलिस ऐसे गायब हो गयी जैसे गधे के सिर से सींग। शीघ्र ही शहर में बीसियों जगहों से काले धुएँ के बादल उठने लगे और आसमान पर छा गये। ये हिंदू बाजार जल रहे थे।

कुछ देर बाद हिंदू भीड़ें, हत्यारे मुसलमानों को मौत के घाट उतारने के लिए खोजती हुई अपने टोलों से एक तूफानी लहर की तरह निकल पड़ी। हिंसा के अपने पूरे इतिहास में कलकत्ता ने पहले कभी इतनी बर्बरता और इतनी मानव-दुष्टता से भरे हुए 24 घंटे नहीं देखे थे। पानी में भीगे हुए लट्ठों की तरह बीसियों फुली हुई लाशें हुगली नदी में बहती हुई समुद्र की ओर जा रही थीं। बहुत-सी बुरी तरह कटी-फटी लाशें शहर की सड़कों पर बिखरी पड़ी थीं। हर जगह कमजोर और बे-सहारा लोग ही सबसे ज्यादा मारे गये। एक चौराहे पर कई मुसलमान रिक्शा वालों की लाशें एक लाइन से पड़ी हुई थीं, जिन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया था। वे अपने रिक्शों के दो डंडों के बीच बैठे किसी सवारी के आ जाने की राह देख रहे थे, जब हिंदुओं की एक भीड़ उन पर टूट पड़ी थी।

यह कत्लेआम खत्म होते-होते शहर पर गिद्धों का कब्जा हो चुका था। उनके गंदे मटियाले झुंड आसमान पर मंडला रहे थे और बीच-बीच में शहर के 6,000 मुर्दो की लाशों से अपना पेट भरने के लिए नीचे की ओर झपट पड़ते थे। कलकत्ता के इस कत्ले-आम की देखा-देखी नोआखाली में खून-खराबा शुरू हो गया, जहाँ गाँधी थे, बिहार में और उप-महाद्वीप के दूसरे सिरे पर बंबई में भी मारकाट शुरू हो गयी। इन घटनाओं ने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी। बरसों से मुसलमानों द्वारा दी गयी धमकी कि अगर उन्हें अलग राज्य न दिया गया तो भारत में खून की नदियाँ बह जाएँगी, आखिरकार एक भयानक सत्य बनकर सामने आ गयी।

अचानक भारत के सामने गृहयुद्ध का वही भयानक दृश्य उभरने लगा जिससे दुखी होकर गाँधी नोआखाली के जंगलों में भटक रहे थे। एक दूसरे आदमी के लिए, उस कठोर और प्रतिभाशाली वकील के लिए जो चौथाई शताब्दी तक गाँधी का सबसे बड़ा मुस्लिम शत्रु रहा था, यह संभावना एक ऐसा औजार बन गयी, जिससे भारत के टुकड़े किये जा सकते थे। स्वयं उनके अपने लोगों के लिखे हुए इतिहास को छोड़कर और किसी भी इतिहास में मुहम्मद अली जिन्ना को वह ऊँचा स्थान नहीं दिया जाएगा, जो उनकी सफलताओं के कारण उन्हें मिलना चाहिए। फिर भी गाँधी या और किसी भी व्यक्ति से अधिक भारत के भविष्य की कुंजी उन्हीं के हाथों में थी।

Iqbal-RahmatAli फाइल चित्र: रहमत अली और मुस्लिम लीग

महारानी विक्टोरिया के पड़नाती का पाला भारत पहुँचने पर इसी कठोर और अड़ियल मुस्लिम मसीहा से पड़ने वाला था, जो अपनी जनता को दूसरों की भूमि पर अपने ख्वाबों की जन्नत बसाने के लिए ले जा रहा था। अगस्त 1946 में बंबई के बाहर एक शामियाने में इसी आदमी ने मुस्लिम लीग के अपने अनुयायियों को सीधी कार्रवाई के दिन का मतलब समझाया था। उसने घोषणा की थी कि अगर कांग्रेस लड़ना चाहती है तो भारत के मुसलमान ‘बिना किसी झिझक के उनकी इस पेशकश को मंजूर कर लेंगे। अपने पीले बे-जान होंठों को भींचकर क्रूर मुसकराहट के साथ और अपनी पैनी आँखों में दबे हुए आक्रोश की चमक लिए हुए जिन्ना ने उस दिन कांग्रेस को और अंग्रेज़ों को खुली चुनौती दी थी। उन्होंने कसम खाई थी—‘हम हिंदुस्तान को बँटवा देंगे या फिर हिंदुस्तान को तबाह कर देंगे?'

मगर पाकिस्तान को उसका नाम देने वाले रहमत अली को, जानते हैं, उनके इस योगदान का क्या इनाम मिला? 1948 में उनकी सारी संपत्ति ज़ब्त कर ली गई और उनको पाकिस्तान से निकाल दिया गया। 1951 में लंदन में उनका बहुत ही ग़रीबी की अवस्था में निधन हो गया। उनका गुनाह केवल इतना था कि वे ‘कटा-पिटा’ पाकिस्तान स्वीकार करने वाले जिन्ना से नाराज़ थे।

स्रोत : डोमिनिक लापिएर (Dominique Lapierre) और लैरी कॉलिंस (Larry Collins) की 1975 में प्रकाशित पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाइट' (Freedom at Midnight) का हिंदी अनुवाद।

    • हमें सहयोग दीजिये
    • अगर आप चाहते हैं कि हम इसी तरह देश विदेश के मुद्दे उठाकर सच का साथ देते रहें, तो आप भी मदद कर सकते हैं। हमारे कर्म में श्रध्दा हो तो दान देकर हमें कृतार्थ करें।


Disclaimer

The views, information, or opinions expressed in the article by the authors are solely their own and do not represent the views of any organisation or entity the author have been, is now or will be affliated. The Present Mirror is an open platform and gives freedom to express all kinds of views and doesn't necessarily represent them. Present Mirror or its author will not be responsible for any errors that may have crept in inadvertently and do not accept any liability whatsoever, for any direct or consequential loss howsoever arising from any use of this publication or its contents or otherwise arising in connection herewith.



अनुशंसित पोस्ट

हाल की पोस्ट