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अनुबंधित रोजगार: सरकार की निजीकरण से कोरोना काल मे बेरोजगार हुए सैकड़ो युवक

  • अभिमत
  • टीम प्रेजेंट मिरर | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: June 26, 2020, 6:40 p.m.




भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इ सी आई एल जैसी अर्ध सरकारी कंपनियाँ, कॉन्ट्रैक्ट रोजगार के नाम पर देश में युवा प्रतिभाओं की बलि दे रहीं हैं। इंजिनियरों को रोजगार देने के नाम पर लिया जाता है और उनका उपयोग होने के बाद उन्हें बेरोजगार कर बीच मझधार में छोड़ दिया जाता है।




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अनुबंधित (कॉन्ट्रैक्ट) रोजगार एक ऐसा अभिशाप है जो भारतवर्ष के युवा का करियर दीमक की भांति खाये जा रहा है। पहले तो देश भर में अखिल भारतीय प्रतियोगिता ( आल इंडिया एग्पजाम ) परीक्षाओं से इन युवाओं की भर्ती की जाती है, फिर उन्हें ऐसे मोड़ पर कंपनी से निकाल दिया जाता है जब उनको उस नौकरी की सबसे ज्यादा जरूरत हो। इन सरकारी कहे जाने वाले कंपनियों के कारनामों से कई युवा इंजीनियर इस देश में डिप्रेशन में जाने को मजबूर हैं।

वर्तमान सरकार ने भी पिछली सरकारों की तरह लाखों लोगों को रोजगार देने का वादा किया। वादा मात्र वादा बन कर रह गया। मामला उतने तक ही रुक जाता तो सैकड़ों युवाओं को डिप्रेशन में नहीं जाना पड़ता। हज़ारों लोगों में से परीक्षा देकर पास हुए काबिल सैकड़ों प्रतिभाओं की छटनी की गई है। जिससे कई युवक डिप्रेस हो गए हैं।

एक तरफ सरकार जहांँ निजी कंपनियों को मजदूरों की तनख्वाह न काटने, उनको मूलभूत सुविधाएँ देने का दबाव डाल रही है वहीं भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बी ई एल) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड जैसी नवरत्न कंपनियों से सैकड़ों युवाओं को निकाल दिया गया है। जवाब में यह कहा गया कि आपका कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो गया है और अब यहांँ काम नहीं है।

मामला यहीं नहीं थमता है। इन कर्मचारियों के मेहनत से एक मोटी रकम भी बी ई एल का मानव संसाधन विभाग काट लेता है। लाजिमी है कि बेरोजगार हो चुके युवकों के पास कंपनी से मिले एक लम्प सम रकम का बड़ा महत्व होता है। इसी के सहारे वे पराये शहर में गुजारा करते हुए नौकरी ढूंँढते हैं। लेकिन उनके इस हक की कमाई को भी बिना बताए काट लिया जाता है। ये 'कोड ऑन वेजेस' एक्ट का साफ़ उल्लंघन है जो कम्पनी सरकार के नाक के नीचे बेशर्म होकर कर रही है।

जब कंपनी से पूछा जाता है कि सैलरी से इतने पैसे क्यों काटे तब कम्पनी यू टर्न लेते हुए कहती है कि ये पैसे लौटा दिए जायेंगे !! सवाल ये है कि जब पैसे लौटाने ही थे तो इस तरह कर्मचारियों की मेहनत की कमाई को रोकना क्या फ्रॉड नहीं है?

हद तो तब हो जाती है जब वही कंपनी एक महीने बाद उसी काम के लिए उन लोगों को फिर से ऑफर करती है लेकिन शर्त यह कि आपको आपकी पुरानी तनख्वाह का आधे से कम हिस्सा ही दिया जाएगा। उनको कोरोना काल में इवीएम पर काम करने बुलाया गया लेकिन बेशर्मी इतनी कि स्वास्थ्य बीमा (मेडिकल इन्सुरेंस) भी कंपनी काट लेना चाहती है।

कर्मचारियों से बात करने पर यह पता चला कि कंपनी को इससे यह फायदा होगा कि उसी काबिलियत के लड़के कम पैसों में मिल जाएंँगे। कोरोना और नौकरी छूट जाने के बाद कोई करेगा भी क्या जीवनयापन के लिए, कुछ लोग आगे बढ़ के हामी भी भर देते हैं। लेकिन इस तरह वो भारत के युवाओं की मज़बूरी का फायदा उठाना चाहते हैं। इससे यह होता है कि उस माननीय पद का मोल कम हो जाता है और अब उस व्यक्ति को अपने पुरानी तनख्वाह तक पहुचने में सालों लग जाएँगे । अब ऐसे में रोज उस व्यक्ति पर क्या बीतती है सिर्फ वही जान सकता है जो उस जगह से गुजरा है। ऐसे में उन सैकड़ों लोगों को डिप्रेशन में भेजने का जिम्मेदार कौन है?

सवाल यह भी उठता है कि अगर काम नहीं था तो फिर से काम कैसे आ गया? आ गया तो क्या उस काम का बजट कम हो गया। या निजीकरण करने वाली लेबर कंपनियों ने युवाओं को मिलने वाले वेतन को भी खाना शुरू कर दिया है? एक तरफ जहाँ सरकार बोलती है कि निजी कंपनियों में रोजगार पारदर्शी होने चाहिए, वहीं बड़ी सरकारी कंपनियाँ ऐसी भर्तियाँ पर्दे के पीछे करती हैं। इन भर्तीयों का डेटा भी कंपनियों के वेबसाइट पर नहीं डाला जाता।

इ सी आई एल पर आरोप है कि कम्पनी ने चुनाव में ईवीएम पर काम करने के लिए जे टी ओ भर्ती किए पर बाद में उन्हें ये कह कर निकाल दिया गया कि अभी कोई प्रोजेक्ट नहीं है। लेकिन 3 दिन बाद कम्पनी ने फिर नये पोस्ट निकाले जिसमें काम वही था, पर नाम बदल दिया गया। सवाल यह है कि जब कम्पनी के पास 187 डेढ़ साल के अनुभव प्राप्त किए इंजीनियर थे तो फिर नयी भर्तियाँ करके और पुराने इंजीनियरों को बेरोजगारी के नर्क में छोड़ कर कम्पनी क्या सिद्ध करना चाहती है?

इ सी आई एल के इंजीनियरों ने प्रेजेंट मिरर को बताया कि वो सभी मध्यम वर्ग के युवा हैं जिनपर उनके पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। इस तरह कम्पनी ने कोरोना काल में उनका हाथ छोड़कर उनके साथ घोर अन्याय किया है। ये युवा कहाँ जायेंगे? क्या करेंगे? इन युवाओं ने बताया कि लेबर कमिशन उनके काम से काफी खुश थी| लेबर कमिशन ने कम्पनी को इन युवाओं के एक्सटेंशन के लिए पत्र भी लिखा, पर कम्पनी ने इसे अनसुना कर दिया|


क्या इस तरह बार-बार रोजगार दिखा कर क्या कम्पनी सरकार के गुड बुक्स में शामिल होना चाहती है? या फिर पीठ पीछे इस तरह बार-बार रिक्रूटमेंट करना कोई स्कैम है? देश का युवा देश सेवा के लक्ष्य से इन अर्ध-सरकारी कम्पनियों में जी लगाकर काम करता है, पर उसे रोजगार के इस भ्रामक चक्रव्यूह में फँसा दिया जाता है।

सवाल तो ये उठता है कि सरकार इन बातों से इतनी अभिज्ञ कैसे है? सरकार ऐसी कौन सी गहरी निद्रा में लीन है जो भारत में चहुँओर उठने वाली युवा इंजीनियरों की पीड़ा भी नहीं सुन पा रही। क्या सरकार यह चाहती है कि अगला सुशांत सिंह राजपूत इन्हीं इंजीनियरों में से कोई हो? अगर ऐसा नहीं है तो सरकार इन कम्पनियों की मनमानी पर कार्यवाही क्यों नहीं करती। एक तरफ जहाँ प्रधानमंत्री सबके साथ और सबके विश्वास की बात करते हैं, वहीँ सरकारी कम्पनियाँ उनकी विचारों की हत्या करने पर आमदा हैं|

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