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ये कौन सी शिवसेना है, ये कौन सी मराठी अस्मिता है?

  • अभिमत
  • सारांश कनौजिया | अध्ययन 3 मिनट | अपडेट किया गया: Sept. 13, 2020, 7:48 a.m.




कार्टूनिस्ट बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना ने तब सारी मर्यादाएँ लांघ दी, सारे सिद्धांत तोड़ दिए, जब एक कार्टून बनाने मात्र से गुंडे भेज कर एक पूर्व नेवी अफसर को मारा पिटा गया। किसने सोचा था कि हिन्दू ह्रदय सम्राट की शिवसेना के नाक के नीचे 3 साधुओं को पुलिस के सामने मौत के घाट उतार दिया जाएगा और सरकार 90 दिन के बाद चार्जशीट भी दायर नहीं करेगी। किसने सोचा था कि यही शिवसेना बॉलीवुड के ड्रग माफियाओं और कातिलों को बचाने के लिए पूरा सिस्टम झोंक देगी? शिवसेना मराठी अस्मिता को और कितना चोट करना चाहती है?




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शिवसेना हर बात को महाराष्ट्र और मराठी सम्मान से जोड़ने का प्रयास करती है। महाराष्ट्र के लोग भी शेष भारत की तरह ही हमारे भाई-बहन हैं, लेकिन शिवसेना उन्हें मराठी मानुष कहकर हमसे हमेशा अलग करने का प्रयास करती रहती है। यह राजनितिक दल स्वयं आगे बढ़ने के लिए हमेशा से ही गैर मराठियों को प्रताड़ित करना अपना अधिकार समझता है। शिवसेना स्वयं को मराठियों का सबसे बड़ा शुभचिंतक मानती है, इसलिए उसे हमेशा ही अपना विरोध मराठियों का अपमान लगता है।

सुशांत सिंह राजपूत के प्रकरण में भी कुछ ऐसा ही हुआ। जैसे ही उनकी मौत की जांच कर रही मुंबई पुलिस पर सवाल उठने शुरू हुए शिवसेना को समस्या होने लगी। इसका कारण यह है कि महाराष्ट्र की सत्ता पर शिवसेना आसीन है। शिवसेना ने सत्ता के लिए अपने पुराने मित्र भाजपा से नाता तोड़ लिया। ऐसे में शिवसेना अपनी सत्ता पर प्रश्नचिन्ह कैसे स्वीकार कर सकती है। उसके निशाने पर जब भी हिंदीभाषी रहे हैं, उसने उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों पर सबसे अधिक प्रहार किया है। शायद यह एक संयोग था किन्तु सुशांत भी बिहारी थे। पहले मराठी मानुष के नाम पर शिवसेना के निशाने पर सुशांत सिंह राजपूत का बिहारी परिवार आया।

दूसरी ओर कंगना के निशाने पर शिवसेना सरकार और मुंबई पुलिस आ गई। शिवसेना जो अपने विरुद्ध एक शब्द नहीं सुन सकती है, इतने आरोप कैसे सहन करती? यही वजह है की कंगना पर शिवसेना की भाषा बिगड़ने लगी। शिवसेना नेता संजय राउत और पार्टी के एक विधायक कंगना को धमकाने लगे। यद्यपि मैं कंगना की भाषा से पूरी तरह सहमत नहीं हूं, लेकिन जिस भाषा का प्रयोग शिवसेना कर रही है, वह लोकतंत्र या संविधान की भाषा नहीं है। इस प्रकार का व्यवहार तो आपराधिक प्रवृति के लोग करते हैं। और तो और शरद पवार निर्मित बिल्डिंग सिर्फ इसलिए गिरा दी क्योंकि उसमें से एक फ्लैट कंगना का था। ऐसे पार्टी को हाई कोर्ट की लगी लतार से क्या कोई फर्क पड़ेगा?

शिवसेना सरकार के गृह मंत्री अनिल देशमुख कहते हैं कि कंगना को मुंबई में रहने का अधिकार नहीं है। किसी प्रदेश के गृहमंत्री को इस प्रकार का बयान शोभा नहीं देता। उन पर जिम्मेदारी है कि वो प्रदेश में रहने या आने वाले लोगों को सुरक्षा प्रदान करें, वे ही इस प्रकार की धमकी दे रहे हैं। अनिल देशमुख के भाई रितेश देशमुख अभिनेता हैं, यदि भगवान न करे, उनके साथ सुशांत जैसी कोई दुर्घटना हो जाती, तो क्या रितेश का परिवार परेशान नहीं होता। यदि उसको न्याय दिलाने के लिए कंगना जैसा कोई आवाज उठाता तो भी क्या अनिल देशमुख उस समय भी इस प्रकार का बयान देते।

अनिल देशमुख एनसीपी से विधायक हैं, किन्तु एनसीपी भी क्षेत्रीय पार्टी होने के कारण शिवसेना से कम नहीं दिखना चाहती है। वो महाराष्ट्र की सत्ता में खुद को कमजोर नहीं साबित होने देना चाहती है। जहां तक शिवसेना का सवाल है तो मराठी मानुष को लेकर वो एनसीपी से हमेशा ही अधिक आक्रामक रही है। इसके पीछे उसके जन्म और इतिहास पर भी चर्चा जरुरी है। शिवसेना की स्थापना 1966 में बाला साहब ठाकरे के द्वारा की गई थी। शिवसेना 1989 में भाजपा के साथ जुड़ी, उसके बाद उसने अपनी रणनीति थोड़ी बदली, लेकिन उससे पहले एक लम्बा कालखंड मराठी सम्मान के लिए खुद को खड़ा दिखाने में लगा दिया।

जब तक शिवसेना भाजपा के साथ नहीं जुड़ी थी, उसने महाराष्ट्र की सीमा से लगने वाले सभी राज्यों के लोगों पर मराठी सम्मान के नाम पर हमले किये। भाजपा के साथ पार्टी जैसे-जैसे आगे बढ़ी, उसने मराठी मानुष के साथ-साथ खुद की हिंदुत्ववादी छवि बनानी शुरू कर दी। बाला साहब के देहांत के बाद उद्धव ठाकरे ने हिंदुत्व पर अधिक जोर दिया, लेकिन शिवसेना को वो सफलता नहीं दिला सके, जो बाला साहब ने दिलाई थी।

यही वजह है कि पहले शिवसेना ने भाजपा का साथ छोड़ा और फिर मराठी सम्मान के नाम पर राजनीति शुरू कर समाज में जहर घोलना शुरू कर दिया। सुशांत और कंगना के मुद्दे को वो इसी लिए मराठी सम्मान का मुद्दा बनाकर अपनी पुरानी छवि को दुबारा मराठियों के मन में बनाना चाहती है। हो सकता है इसके लिए वो हिंदी भाषियों और उनके समर्थकों पर हमले भी शुरू करवा दे। ये एक बहुत ही कमजोर और विवेकहीन शिवसेना है जिसकी डोर कलयुग के उस पंगु ध्रितराष्ट्र के हाथ में है, जो पुत्र मोह में हर मर्यादा भूल चूका है।

(लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं)

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