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अंग्रेजी के पीछे भागता वर्ग, क्या जानता है, देश की पहचान अंग्रेजी नहीं?

  • अभिमत
  • प्रीती मिश्रा त्रिपाठी | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: May 28, 2020, 5:46 p.m.




हिंदी और संस्कृत ऐसी उन्नत भाषाएँ हैं, जिनका महत्व सिर्फ भारत में ही नही समझा जाता, जबकि विदेशी इस पर शोध करते हैं, इसके बारे जानने की कोशिश करते हैं। लेकिन अफसोस! भारत में अपनी ही भाषा महत्वहीन और मेहमान होकर रह गयी है और संस्कृत तो विलुप्तप्राय है।




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अब क्या करें, जब संविधान बना तब किसी को भी यह आवश्यक ही नहीं लगा कि पहले हमे अपनी भाषा और संस्कृति को महत्व देना चाहिए क्योंकि सबको आज़ादी मिली थी वर्षों बाद। इसीलिए सब आज़ादी के ऊपर ही कानून बनाने में लगे हुए थे।

किसी को अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहिए थी तो किसी को जाति प्रथा से, तो किसी को आरक्षण चाहिए था अपनी जाति के लिए, जबकि ऐसे संविधान बनाने वाले खुद बिना इस तरह की आज़ादी के ही उभरे थे। लेकिन सब अपने अपने स्वार्थ के बारे में सोच कर कानून बना रहे थे।

किसी ने प्रश्न भी किया भाषा और संस्कृति पर, तो उन्हें ये कहकर चुप कर दिया गया कि यह अभी इतना महत्वपूर्ण नहीं है। जबकि इसी भाषा और संस्कृति की डोर पकड़कर आज चीन, जापान, अमेरिका विकास कर गए।

लेकिन हम आज भी अंग्रेज़ी की पूंछ पकड़कर लटके हैं। अंग्रेजी भी अच्छी भाषा है, लेकिन अपनी एक पहचान होना परम आवश्यक है।

इसमें सबसे बड़ा योगदान मैं उन नेताओं का ही मानती हूं, जिनके कारण लोगो के मन में आज यह बात इस तरह से बैठ गयी है कि अंग्रेज़ी के बिना तो जीवन ही नहीं ,विकास ही नहीं है या हमारा कोई भविष्य ही नहीं। जबकि ऐसे कितने सारे नाम हैं जो की इस धारणा को नकारते हैं, जैसे कल्पना चावला, धीरू भाई अम्बानी, और भाई ज्यादा दूर क्यों जाते हैं अपने रविश कुमार को ही ले लीजिये, उसे तो अंग्रेज़ी बोलनी भी नहीं आती लेकिन अपने ट्विटर पर गर्व से लिख रखा है कि अंग्रेज़ी नहीं आती।

लेकिन ऐसे लोग जिनकी मातृभाषा हिंदी है और फिर भी गर्व से सर उठाकर बोलते हैं कि ओहो मुझे तो आता ही नहीं, हिंदी में कैसे लिखते हैं? शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को और इस प्रकृति को बढ़ाने वाले स्कूलों पर, क्योंकि वो सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि अपने देश, अपनी भाषा, और उन सभी लोगो का अपमान कर रहे हैं जिन्होंने इसे बचाने का प्रयास किया, और कर रहे हैं।

ये सभी जो अंग्रेज़ी मीडियम और मिशनरी स्कूल खोल रखे हैं सब ढोंग और पैसा लूटने का तरीका है। और अगर नहीं है तो क्या ये लोग अंग्रेज़ी में बोलने को छोड़कर, क्या ये सब काम खाना, नहाना, उठना, बैठना अंग्रेज़ी में सीखा सकते हैं? नहीं सीखा सकते!

लेकिन फिर भी अंग्रेज़ी को मात्र एक भाषा के रूप पढ़ाने की जगह पूरे स्कूल का माध्यम ही बदल देते हैं। क्योंकि समाज में मान्यता हो गयी है की कान्वेंट स्कूल में पढ़े हुए लोग सभ्य होते हैं। जबकि सभ्यता सीखने की शुरुआत घर से होती है, ना कि स्कूल से और ये याद रखिये की अंग्रेज़ी बोलने वाला ज़रूरी नहीं कि पारंगत और विद्वान है और हिंदी और संस्कृत बोलने वाला अनपढ़ है।

रही बात हिंदी भाषा के दक्षिण क्षेत्रों में “हिन्थी इम्पोजिसन” की। तो ये समझिये कि जब हिंदी में देसज विदेसज शब्द जोड़े गए तो कुछ दक्षिण भाषाओँ के शब्दों और व्याकरण सिद्द्धांतों का योग करके एक देश को जोड़ने का रक्षासूत्र बनाया जा सकता था। लेकिन राजनीतिज्ञों ने इस को वोट बटोरने का जरिया बनाया और देश को बाँटने की एक खिड़की खुली छोड़ दी गयी।

तो कृपया, अपनी सभ्यता और संस्कृति को पहचानिए इसे आगे बढाइये, ना की किसी ऐसे की जिसकी गुलामी हमने 100 वर्षों तक की है और ऐसा लगता है की आज भी कर रहे हैं। हमारी पहचान अंग्रेजी नहीं हो सकती। चाहे देव भाषा संस्कृत को बना लीजिये, लेकिन एक सूत्र में जोड़ने के लिए देश में एक राष्ट्रभाषा का होना अत्यंत आवश्यक है।

अंत में मेरा तो यही कहना है की नई भाषा सीखें, लेकिन इतना महत्व न दें कि हमारी अपनी संस्कृति अपनी वास्तविकता खो दें, वैसे ही सीखें जैसे अन्य देश हिंदी सीखते हैं, अंग्रेज़ी सीखें लेकिन गुलामी ना करें, क्योंकि हम आज़ाद हो चुके हैं और अपने बच्चों को भी यही शिक्षा दें।

क्योंकि,

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

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