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माँ सीता की अग्निपरीक्षा, क्या कहा है वाल्मीकि रामायण में, क्या है सच?

  • अभिमत
  • विष्वक्सेन | अध्ययन 3 मिनट | अपडेट किया गया: April 19, 2020, 9:59 a.m.




कई स्वघोषित महाज्ञानीओं के एक विशेष वर्ग ने प्रश्न भी किया कि जो इस एपिसोड में दिखाया गया वो वाल्मीकि रामायण में अंकित नहीं है| वाल्मीकि ने अगर घटना कैसे घटित हुई उसका वर्णन किया है, तो व्यास ने उस घटना के मूल मंत्र को प्रस्तुत किया है| इनकी कुंठा का नींव ही वो सवाल है जो माँ सीता को एक पितृसतात्मक सत्ता में ‘बेचारी प्रताड़ित स्त्री’ की संज्ञा देने पर तुला हुआ है|




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दूरदर्शन पर प्रसारित बहुचर्चित चलचित्र समूह ‘रामायण’ अब समाप्ति की ओर अग्रसर है| जिस तरह से कोरोना से जूझते इस देश को रामानंद सागर के इस सीरियल ने न सिर्फ सत्य के विजय के लिए लड़ने की सीख दी, वहीँ घर में प्रधानमंत्री के आह्वाहन पर स्वतः कैद जनसमूह को एक आशा की किरण भी मिली| कल के एपिसोड में दिखाये गए माँ सीता की अग्निपरीक्षा प्रसंग पर सोशल मिडिया में खूब चर्चा हुई| कई स्वघोषित महाज्ञानीओं के एक विशेष वर्ग ने प्रश्न भी किया कि जो इस एपिसोड में दिखाया गया वो वाल्मीकि रामायण में अंकित नहीं है|

सबसे पहले समझने की अव्यश्कता ये है कि वाल्मीकि रामायण क्यों लिखी गयी| वाल्मीकि ने स्वयं रामायण नारद मुनि के मुख से सुना, इसका संक्षिप्त वर्णन वे बालकाण्ड में करते हैं, जो ‘संक्षिप्त रामायण’ के नाम से भी प्रसिद्ध है| उसके बाद वाल्मीकि ने इसको कथा युक्त किया| महर्षि वाल्मीकि रामायण को इतिहास बुलाते हुए लिखते हैं, “पुर्ववृत्तं कथायुक्तं इतिहास प्रचक्षते, अर्थात जो बीत गया है, जो कहानी के रूप में कहा गया है, इतिहास वही है| वाल्मीकि ने श्री राम को इस कथा में एक महामानव दिखाने की कोशिश की| पर ऐसा नहीं है कि वो श्री राम को अवतार नहीं मानते| युद्धकाण्ड में वाल्मीकि ने श्री राम को “कर्ता सर्वस्य लोकस्य श्रेष्ठो ज्ञानवतां प्रभुः” और “भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः” बुलाया है| लेकिन फिर भी अधिकतर वाल्मीकि श्री राम की मर्यादा पुरषोत्तम अर्थात मर्यादा का पालन करने वाले पुरुष के रुप में छवि प्रत्यक्ष करते हैं|

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जबकि रामायण सीरियल में दिखाए जाने वाला प्रसंग महामुनि वेद व्यास रचित अध्यात्म रामायण में है| तो क्या इसका अर्थ है, वाल्मीकि ने गलत कहा है? जी नहीं| वाल्मीकि अपनी जगह ठीक हैं और व्यास अपनी जगह| वाल्मीकि ने अगर घटना कैसे घटित हुई उसका वर्णन किया है, तो व्यास ने उस घटना के मूल मंत्र को प्रस्तुत किया है| ये कोई कैसे मान सकता है, कि किस्किंधा नरेश सुग्रीव को अपनी पत्नी रूमा को अपनाने की आज्ञा देने वाला, स्वयं ही ऐसा करेगा?

अध्यात्म रामायण से ही प्रेरित होकर महाकवि तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखी| महामुनि व्यास ने लिखा है कि, श्री राम ने ये लीला इसलिए किया, क्योंकि माँ सीता को अग्नि देव के पास से पुनः लाना था| उनको तब तक वापस नहीं लाया जा सकता था, जब तक माया सीता अग्नि में प्रवेश नहीं कर जातीं| व्यास जी ने इस प्रसंग की चर्चा भी की है जहाँ रावण के हरन से पुर्व वैदेही अग्नि में समा जातीं हैं, और रावण माया सीता को हर ले जाता है| स्वयं अग्निदेव इस प्रसंग की चर्चा करते हैं|

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व्यास रचित अध्यात्म रामायण का एक अंश

रावण एक बलात्कारी एवं अधर्मी पुरुष था, जिसे कई अप्सराओं तथा नल कुबेर का श्राप मिला था| श्राप के अनुसार पर-स्त्री का उसके मन विपरीत, लज्जा भंग करने पर, रावण के शरीर के सौ टुकड़े हो जायेंगे|

माँ सीता को वैदेही इसलिए कहते हैं क्यूंकि वो महात्मा जनक की पुत्री थीं| महाराज जनक को विदेह भी कहा जाता है, विदेह अर्थात वो जो अपने देह और आत्मा को अलग कर सके| माँ सीता भी एक तपस्विनी थीं| महान शिव्भक्तिनी, जो उस शिव धनुष की नियमित पूजा और साफ सफाई करती थीं, जो बड़े बड़े महारथियों से नहीं उठा| उस महासती को अगर रावण स्पर्श करता तो स्वयं भस्म हो जाता| जहाँ वाल्मीकि इतिहास बता रहे थे, वहीँ व्यास उसके पीछे छुपे मर्म को समझा रहे थे|

अनंत रामायण के अनुसार जिसे रावण हरन कर जाता है वो अप्सरा वेदवती हैं, जो रावण से बदला लेने हेतु और श्राप पूर्ण करने हेतु, वैदेही से अपनी आत्मा बदल लेती हैं| अग्नि पुराण के अनुसार वो अग्नि की भार्या स्वाहा हैं, जो रावण से प्रतिशोध की भावना से माया सीता बन हर ली जाती हैं, जो रावण का सर्वनाश बनने के लिए ये स्वांग करती हैं|

रामानन्द सागर ने उनकी कुंठित मानसिकता पर आघात किया है जो सनातन धर्म पर लांछन लगाने कि राह देख रहे थे , लेकिन उनको घोर निराशा हुई| इनकी कुंठा का नींव ही वो सवाल है जो माँ सीता को एक पितृसतात्मक सत्ता में ‘बेचारी प्रताड़ित स्त्री’ की संज्ञा देने पर तुला हुआ है| सवाल यही है न कि हिन्दू धर्म में स्वयंभू श्री राम ने एक अबला स्त्री की पवित्रता की अग्नि परीक्षा ली| लेकिन अध्यात्म रामायण भी 3000 साल पूर्व रचित महाभारत काल के हिन्दू धर्म का ही हिस्सा है| फिर अगर इसमें ऐसी किसी भावना का समर्थन नहीं है तो सवाल ही क्यों?

आपका बेचारी अबला नारी वाला नैरेटिव औंधे मुँह जा गिरा है| वो नैरेटिव जो एक भूखे भेड़िये की भांति सनातन संस्कृति पर टूटने को आमदा है लेकिन उसे लॉकडाउन में सुखी घास के सिवाय कुछ नहीं मिला| वो कभी नहीं समझेंगे उस संस्कृति को जो जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी पर टिका है और यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः का परिचायक है|

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