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राहत इंदौरी, एक सोच : शायरी या षड्यंत्र?

  • देश
  • सूरज उपाध्याय | अध्ययन 3 मिनट | अपडेट किया गया: Aug. 14, 2020, 11:54 a.m.




कोवीड बीमारी से ग्रस्त, मशहूर शायर राहत इंदौरी मंगलवार को इस दुनिया को अलविदा कह गए। पूरा हिंदुस्तान उनके निधन पर शोक मग्न है। सब उनकी शायरियाँ लिख रहे हैं पढ़ रहे हैं सुना रहे हैं, पर कितने उसको समझ पा रहे हैं। शायरी, मीठी होती है अक्सर, पर क्या हर मीठी चीज़ खा लेनी चाहिए? मीठा तो मध भी होता है, जहर भी होता है।




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एक शायर में इतना दम होता है की वो अपने लफ्जों से भारत के तीन टुकड़े कर सकता है ! जिनको ये बात नागवार और फिजूल लग रही है, वो इक़बाल को पढ़ें।

मैने स्वयं राहत इंदौरी का एक मुशायरा अटेंड किया था, उसका वाकया सुनाता हूँ।

हर शायर का एक हस्ताक्षर होता है, तो राहत का दस्तखत था, "सबका खून शामिल है" और इसे शायरी या गजल समझना बेवकूफी है! तो उस मुशायरे में सुनने वालो में दोनो समुदाय के लगभग आधे आधे लोग थे! पर ये शायरी की ताकत है की जब आप उसे सुनते हैं तो सेक्युलर हो जाते हैं।

फिर राहत ने वो पंक्ति पढ़ी.....
जो आज "साहिब ए मसनद हैं" वो कल नही होंगे...... फिर वो रुक गये और आंखे बड़ी की, दांत बाहर निकाले और आस्तीन उपर की इतना करते ही "भीड़" चिल्ला उठी

"इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह"

यहाँ "साहिब ए मसनद" का मतलब भारत के वज़ीर ए आज़म से था।
वो शेर मे भी दीन-ईमान का ख्याल रखते हैं।

एक शायर हजार युवाओं की फौज खड़ा कर देता है, अपने मजहब के लिए कुछ ऐसे शब्द दे देता है जो इतिहास बन जाता है, लड़ने के लिए प्रेरणा बन जाता है! यही तुमसे हम देखेंगे गवाता है और पीछे से काबे से बुत उठवाता है।

शायरी बहुत अच्छी वस्तु है,
बशर्ते ऐसे शायर हमारे पास नही हैं, एक कविवर हैं भी तो कन्या राशि के! उपर से सात से दस लाख चाहिए और उनको भी राम, इमाम ए हिंद नजर आते हैं। और बिना भाजपा, मोदी और हाइपर राष्ट्रवादियों की चुटकी लिए इनकी कमर में लचकन ही नहीं आती!



रंग चेहरे का सर्द कैसा है.. आईना गर्द-गर्द कैसा है.. काम घुटनों से जब लिया ही नहीं, फिर ये घुटनों में दर्द कैसा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए उनकी बीमारी पर ये कहने वाला कौन था? वही जिन्हें पहले तो अहद में दाढ़ीयों और तिलकधारियों से दिक्कत थी। पर फिर वही जो शायरी की आड़ में गोधरा जैसी घटना पर दाढ़ीयों को क्लीन चीट दे बैठे थे। जो मुर्दा नहीं जलाता, जिंदा नहीं जला सकता, क्यों। और जलाया तो शायरी हैं ही, देश में तनाव है क्या, देखो कहीं चुनाव है क्या। दिल्ली दंगे या बंगलौर हिंसा में फिर ये शायरियाँ आपसे पूछेंगी, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है?

कौवा बोलता कठोर है और उसका यही हुनर उसको इस ख़तरनाक दुनिया के बाकी जानवरों से बचाता है!! तोता बहुत मीठा बोलता है और नतीजा आप जानते हैं।

सुपुर्द-ए-ख़ाक हो जायेंगे कहते थे,
लहू से हिंदुस्तान लिखेंगे कहते थे,
बड़ा मीठा आपने मंजर कर दिया!
मुशायरा न बोला कुछ, नज़्म न पढ़े कोई,
तुम्हारी गंगा जमुनी तहजीब,
जब सरेआम खंजर कर दिया!
तिलकधारीयों पर तंज, दाढ़ीयों पर चुप्पी,
खून शामिल है जिस मिट्टी में कहते थे,
हे राहत! उसी मिट्टी को बंजर कर दिया?
राहत भाई को ॐ शांति।

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