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अयोध्या भूमि पूजन : भारतवर्ष के इतिहास की महा दिवाली, क्या है तैयारियाँ

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  • टीम प्रेजेंट मिरर | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: Aug. 5, 2020, 7:06 a.m.




आगामी कृष्णपक्ष द्वितीया, संवत 2077 तदनुसार 5 अगस्त 2020 को श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निमार्ण कार्यारम्भ हेतु भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी अयोध्या पधार रहे हैं। इस हेतु भारत की मिट्टी से जन्मी प्रमुख 36 परम्पराओं के 135 पूज्य संत महात्माओं को एवं अन्य विशिष्ट अतिथिगणों को आमंत्रित किया गया है। सबकी उत्कठ इच्छा थी कि 1984 में प्रारम्भ हुए श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के 77वें आन्दोलन में भाग लेने वाले रामभक्त बड़ी संख्या में उपस्थित रहते।




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आमंत्रित संतगणों में दशनामी सन्यासी परम्परा, रामानन्द वैष्णव परम्परा, रामानुज परम्परा, नाथ परम्परा, निम्बार्क, माध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, रामसनेही, कृष्णप्रणामी, उदासीन, निर्मले सन्त, कबीर पन्थी, चिन्मय मिशन, रामकृष्ण मिशन, लिंगायत, वाल्मीकि सन्त, रविदासी सन्त, आर्य समाज, सिक्ख परम्परा, बौद्ध, जैन, सन्त कैवल्य ज्ञान, सतपंथ, इस्कान, स्वामीनारायण, वारकरी, एकनाथ, बंजारा सन्त, वनवासी सन्त, आदिवासी गौण, गुरु परम्परा, भारत सेवाश्रम संघ, आचार्य समाज, सन्त समिति, सिन्धी सन्त, अखाड़ा परिषद के पदाधिकारी। नेपाल से भी पूज्य संत कार्यक्रम में उपस्थित रहेंगे।

अयोध्या राम मंदिर का विधिवत भूमि पूजन यहाँ लाइव देखिए



निमन्त्रण पत्र तैयार होकर आ गया और सभी आमंत्रित गणों को पहुंचाया जा रहा है। सुरक्षा की दृष्टि से एक कार्ड पर एक ही व्यक्ति का प्रवेश होगा, कार्ड के साथ अपना अधिकृत परिचय पत्र लाना अनिवार्य होगा। कार्यक्रम में किसी प्रकार का मोबाइल व बैग पूर्णतयः वर्जित है। मुख्यमंत्री आवास भी पूर्ण रूप से सजा है।

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फाईल चित्र : मुख्यमंत्री आवास के अन्दर सजावट की कुछ तस्वीरें

यद्यपि भूमि पूजन एवं कार्यारम्भ का मुख्य कार्यक्रम दिनांक 5 अगस्त 2020 को माननीय प्रधानमंत्री जी के करकमलों द्वारा विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक के सरसंघचालक पूज्य मोहन भागवत जी की उपस्थिति में वैदिक रीति द्वारा संपन्न होना है तथापि श्रीराम जन्मभूमि पर पूजन का यह क्रम 108 दिन पहले 18 अप्रैल 2020 से आरम्भ हो गया था जिसमें प्रतिदिन वेदपाठ, पुरुष सूक्त, श्रीसूक्त, अघोरमंत्र, वास्तु, ग्रह, नक्षत्र शान्ति के पाठ एवं विश्व सहस्त्र नाम, श्रीराम सहस्त्र नाम, श्री हनुमत सहस्त्र नाम, दुर्गा सप्तसती पाठ के मंत्रों द्वारा हवन एवं रुद्राभिषेक भी किया गया। जिससे कि सम्पूर्ण क्षेत्र प्रचण्ड आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत रहे। ४ अगस्त की रात को पूरा सरयू घाट दीपों से उज्ज्वल रहा, इतना कि मनमोहक छटा देखते ही बनती है।

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दूल्हन सी सजी अयोध्या की कुछ तस्वीरें

हरे रंग वस्त्र पर विवाद व्यर्थ

जानकारी में आया है कि कुछ लोगों द्वारा दिनांक 5 अगस्त 2020 को भगवान के श्रृंगार में हरे रंग वस्त्रों पर पर विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। इसक सम्बन्ध प्रधानमंत्री कार्यालय या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से नहीं है। यह विषय पूर्णतः मुख्य पुजारी और परम्परा से है।

मुख्य पुजारी स्थापित परम्पराओं के अनुरूप करते हैं। पूरा भारत जानता है कि देव विग्रह के वस्त्रों का निर्धारण प्रत्येक दिन के स्वामी ग्रह और उससे संबंधित रंग के आधार पर किया जाता है। यह बात सर्वज्ञात है कि बुध ग्रह का संबंध हरे रंग से है और इस परंपरा का पालन जबसे रामलला विराजमान वहाँ बैठे हैं तब से किया जा रहा है। इस पर टिप्पणी करना किसी अन्य प्रकार के पूर्वाग्रह का द्योतक है।

पुरे देश से आये 100 नदियों के पानी से होगा भूमि पूजन

पूरे देश से लगभग 1500 से भी अधिक स्थानों से पवित्र एवं ऐतिहासिक स्थलों की मृदा (मिट्टी) तथा 2000 से भी अधिक स्थानों व देश की 100 से भी अधिक पवित्र नदियों एवं सैकड़ों कुण्डों के जल देश के कोने-कोने से रामभक्तों द्वारा लाए गए हैं। देश में व्याप्त उत्साह का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अनेक बन्धु-भगनियों ने अपने आस-पास का पवित्र जल अथवा संरक्षित जल कोरियर द्वारा तीर्थ क्षेत्र के कार्यालय अथवा कारसेवकपुरम् में प्रेषित किया है। इसमें प्रमुख रूप से गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र, झेलम, शतलुज, रावी, चिनाव व व्यास सहित समस्त पवित्र नदियों एवं देश के सभी प्रसिद्ध पवित्र कुण्डों का जल सम्मिलित है।

इसके साथ ही साथ अनेकों ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व के स्थानों की मिट्टी व जल भेजा गया है। जिनमें प्रमुख रूप से हल्दीघाटी की मिट्टी, चित्तौड़ दुर्ग की मिट्टी, स्वर्ण मन्दिर के कुण्ड का जल व मिट्टी, वैष्णों देवी की मिट्टी, मैसेकर घाट (मैस्कर घाट)-कानपुर, बिठूर में ब्रह्मखूंटी व नाना साहब पेशवा के किले की मिट्टी, रायगढ़ किले की मिट्टी, सभी ज्योतिर्लिंगों के प्रांगण की मिट्टी, सरस्वती उद्गम स्थल का जल व रज, रविदास मन्दिर काशी की रज एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्गम स्थली नागपर की रज, व पवित्र जल, मानसरोवर की पवित्र रज व जल आदि अयोध्या पहुँच चुके हैं।

अयोध्या जाने का सौभाग्य न मिला तो कोई बात नहीं, राम नाम ले लीजिए, बहुत है

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ड्रोन से हवाई कैमरे में कैद अयोध्या की मनमोहक छटा

भगवान राम जब अवतरित हुए तब सारा देव समाज उस समय अयोध्या आ चुका था। सूरज के घोड़े कुछ समय रथ छोड़ अवध आ गये थे। प्रभु श्री राम जब बाल्य रूप में थे तब तमाम देवी देवता छद्म रूप धर कर उनके दर्शन करने आते थे। राम जी की बारात जब जनकपुर से वापस आ रही थी तो सभी कुंवारों का विवाह जनक पुर में हो चुका था। प्रमाण के लिए तुलसी बाबा कहते हैं....

जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी
"सकल कुँअर" ब्याहे तेहि करनी ।।

प्रभु श्री राम जब वन जा रहे थे तो उस दिन अवध में एक भी चूल्हा नही जला था, राम ने आनन फानन में वन जाना इस लिए चुना क्योंकि वो जानते थे की यदि भरत आ गया तो उनका वन जाना आसान नहीं होगा।

प्रभु राम जब माता सीता भैया लखन के साथ केवट की नाव में बैठ कर गंगा पार रहे थे तो केवट ने खूब घुमाया था। पल भर की दूरी तय करने में केवट ने पहर भर लगा दिया था। ताकी वो मन भर के अपने राम को निहार सके।

जब भरत राम को मनाने वन जा रहे थे तो उसी केवट ने पूरी प्रजा को एक ही खेवे में हजार नौका बुलाकर सबको पार उतार दिया था। केवट, निषाद राज श्रंगबेरपुर और सबरी ये तीन ऐसे भक्त थे जिनको एक भी मंत्र याद नहीं था पर मेरे राम ने इनसे भर पेट भेंट की थी।

राम नाम वो पवित्र शब्द हैं जो विद्वान-अनपढ़, राजा-रंक, स्त्री-पुरुष, धनि-निर्धन सब एक समान ले सकता है। राम नाम ही वो एक शब्द है, जिसने भारत वर्ष को एक सूत्र में बाँध रखा है। नारायण का रा, और महादेव का म मिलकर बनाता है राम।

श्रीपद्मपुराण, पातालखण्ड में कहा गया है,

सर्वेषां वेदशास्त्राणां रहस्यंतेप्रकाशितम् ।
एको देवो रामचंद्रो व्रतं एको तदर्चनम् ।
मंत्रोऽप्येकश्च तन्नाम शास्त्रं तद् ध्येवतत्स्तुतिः ॥
तस्मात् सर्वात्मना रामचंद्रंभजमनोहरम् ।
यथा गोष्पवदवत्तुच्छो भवेत् संसारसागरः ॥
(श्रीपद्मपुराण, पातालखण्ड ३५।५१-५२)


सभी शास्त्रों में सभी वेदों में यही कहा गया है, एक ही देव हों, राम| एक ही व्रत हो राम नाम| एक ही शास्त्र हो रामायण| राम नाम का जाप ही भवसागर पार करा सकता है| इसलिए सभी इसका जाप करें|

रामनामैव नामैव नामैव मम् जीवनम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ स्कन्द पुराण में श्रीसनत्कुमार नारद जी से कहते हैं — श्री राम जी का नाम, केवल श्री राम नाम हीं, राम नाम हीं मेरा जीवन है । कलियुग में राम नाम के सिवाय और किसी उपाय से जीवो सद्गति नही होती, नहीं होती, नहीं होती ।

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रावण ने सीता हरण तब किया था जब राम धनुष पर तीर साधे हिरन (मारीच) के पीछे भाग रहे थे, रावण ने ऐसी योजना बस इसलिए बनाई थी की राम सीता की आवाज सुनकर कहीं वापस ना आ जाएँ। ये सब रामायण के बहुत रोचक प्रसंग हैं जो बहुत दिनों मे पता चलता है अब आप याद रखिएगा। और साथ साथ यह भी याद रखिए की वही राम जिनके वन में हील बील कोल मकोल कूल भील बानर भालू साथी बनकर दुनिया के सबसे पराक्रमी एम्पायर की ईंट से ईंट बजा दी थी..... वही राम कलयुग में "पांच सौ तेइस बरस" बिना छत के थे। याद रखियेगा।

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