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क्या कृषि बिल पर हो रहा विरोध उचित है?

  • देश
  • आशीष सिंह तोमर | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: Sept. 20, 2020, 11:33 p.m.




नये कृषि बिल के विषय में किसानों और आमजनमानस के बीच बहुत ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 तथा आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक - 2020 चर्चा में बने हुए हैं। आइए इन विधेयकों के विषय में कुछ जरूरी बातों को जान लें। सही क्या और गलत क्या ? क्या किसानों का "तीन विधेयक" के विरुद्ध आंदोलन उचित है या नहीं ?




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सन् 1960-70 के आसपास देश में काँग्रेसी सरकार ने एक कानून पास किया जिसका नाम था - "APMC Act", इस एक्ट में यह प्रावधान किया गया कि किसान अपनी उपज केवल सरकार द्वारा तय स्थान अर्थात सरकारी मंडी में ही बेच सकता है। इस मंडी के बाहर किसान अपनी उपज नहीं बेच सकता था और इस मंडी में कृषि उपज की खरीद भी वही व्यक्ति कर सकता था जो एपीएमसी कानून में रजिस्टर्ड हो, कोई दूसरा नहीं।

इन registered person को देशी भाषा में कहते हैं "आढ़तिया" यानि "कमीशन एजेंट"।

मोदी सरकार द्वारा किसानों की हालत सुधारने के लिए ये तीन विधेयक लाए गए हैं जिसमें निम्नलिखित सुधार किए गए हैं -

1. अब किसान मंडी के बाहर भी अपनी फसल बेच सकता है और मंडी के अंदर भी ।
2. किसान का सामान कोई भी व्यक्ति संस्था खरीद सकती है जिसके पास पैन कार्ड हो।
3. अगर फसल मंडी के बाहर बिकती है तो राज्य सरकार किसान से कोई भी टैक्स वसूल नहीं सकती।
4. किसान अपनी फसल किसी राज्य में किसी भी व्यक्ति को बेच सकता है।
5. किसान contract farming करने के लिये अब स्वतंत्र है।


कई लोग इन विधेयकों के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहें है जो निम्नलिखित हैं -

1. आरोप :- सरकार ने मंडीकरण खत्म कर दिया है ?

उत्तर :- सरकार ने मंडीकरण खत्म नहीं किया। मण्डियाँ भी रहेंगी लेकिन किसान को एक विकल्प दे दिया गया है कि अगर उसको सही दाम मिलता है तो वह कहीं भी अपनी फसल बेच सकता है ; मंडी में भी और मंडी के बाहर भी।

2. आरोप :- सरकार MSP समाप्त कर रही है ?

उत्तर :- मंडीकरण अलग चीज़ है एमएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य अलग चीज़ है। एमएसपी केवल 23 फसलों के लिए ही सालाना घोषित की जाती है |

3. आरोप :- सारी फसल अम्बानी खरीद लेगा

उत्तर :- वह तो अब भी खरीद सकता है - आढ़तियों को बीच में डालकर।

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यह तीन कानून किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुक्ति के कानून हैं। आज इस सरकार ने किसानों पर काँग्रेस द्वारा लगाई हुई "बंदिशों" को हटा कर "हर किसी को" अपनी उपज बेचने के लिए आजाद करके "पूरे देश का बाजार" किसानों के लिए खोल दिया है जिसमें किसानों को कोई टैक्स भी नहीं देना होगा। जो लोग भी विरोध कर रहे हैं वो उनकी अपनी समझ हो सकती है पर अभी तक ये सरकार सर्वाधिक "किसान हितेषी" सिद्ध होने में लगी है ।

हिमाचल का सेब 20 रुपये में खरीदने वाले 60 में मंडी में बेचते है जो हमें 100 - 120 रुपए में मिलता है। मंसूरी चावल किसान 15 रुपये किलो में बेचता है लेकिन यही चावल मंडी में 60 रुपये किलो और सुपरमार्केट में 90 रुपये किलो तक बिकता है। सरकार इसी दलाली को खत्म करना चाहती है जिसका विरोध हो रहा है। यूपीए-2 के समय "फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया" (FCI) का हर जिले में PPP मॉडल पर वेयरहाउस खड़े करने का एक कार्यक्रम आया था। इसके तहत MSP पर खरीदे गए अन्न भंडार रखे गए। बदले में प्रति वर्ग फुट किराया मिला। वेयरहाउस खड़े करने में सरकार ने 50% सब्सिडी अलग से दी। करोड़ों का काले को सफेद करने का खेल भी हुआ। इसमें पंजाब और हरियाणा के राजनेता बाजी मार ले गए। यूपी के बड़े किसान और राजनेता भी जैसे-तैसे रुपए में दो-चार पैसे झटक ही ले गए।

खैर, अब यदि एमएसपी पर अन्न की खरीद कम होगी तो उधर वेयरहाउस का किराया भी तो कम होगा। हो सकता है, कल खाली वेयरहाउस में चूहे भी ना कूदें। इस बिंदु पर "मंडी परिषद" एफसीआई, नैफेड जैसी संस्थाओं की "असल भूमिका" समझिए।

उत्तर प्रदेश के 36 जिलों में "सुखबीर एग्रो" नाम से पचास-पचास एकड़ वाले वेयरहाउसेस हैं। यह नाम ही काफी है, एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की वजह जानने के लिए। धंधे पर चोट ऐसे ही नहीं पड़ी। सुखबीर एग्रो के पास धान की भूसी से बिजली बनाने के प्लांट भी हैं। अब बिजली तैयार करने के लिए धान कहाँ से आएगा ?

मंडी कथा बहुत सारगर्भित कथा है। प्रधानमंत्री जब "बिचौलियों" का जिक्र करते हैं तो उनके निशाने पर छोटे आढ़त नहीं, विकराल मगरमच्छ हैं जिन्होंने आढ़तियों को भी महज "मामूली टूल" बनाकर रख दिया है।

जिस हिसाब से मोदी सरकार इस विधेयक के आलोचकों और विरोधियों को तथ्यों के सहारे आड़े हाथों ले रही है, उससे नीतियाँ आक्रामकता की ओर अग्रसर दिख रही है। तस्वीर को इतना छोटा समझने की भूल कतई ना करें।

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