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जानिए डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के सिवान को अपराध के लिए कुख्यात बनाने वाले शहाबुद्दीन का सच

  • देश
  • गौतम | अध्ययन 5 मिनट | अपडेट किया गया: Nov. 2, 2020, 3:40 p.m.




सिवान की थर्राती सड़कों में खौफ पलता है। लालू के चहेते शहाबु-47 का खौफ, जिसके खिलाफ आज तक कोई नहीं बोला। और जो हिम्मत कर गए वो या तो राजीव रंजन की तरह भुन दिए गए, या चंदा बाबु के बेटों की तरह तेजाब से जला दिए गए। इस बार फिर बिहार चुनाव में शहाबुद्दीन की धमक है।




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वर्तमान बिहार का एक बेहद प्यारा जिला है सिवान, 1518 गांवों, तीन नगरपालिकाओं में रहनेवाली 33,30,464 लोगों की आबादी को 2219 वर्ग किलोमीटर में समेट लेने वाला यह जिला प्रसिद्धि पाता है जीरादेई नामक गांव के कारण। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद सिवान के जीरादेई में ही पैदा हुए थे। बिहार की पहचान उन्हीं देशरत्न से हुआ करती थी।

लेकिन वो कहते हैं ना, अच्छा समय ज्यादा समय नहीं टिकता और वही सिवान के साथ भी हुआ, सन 1990 में सामाजिक न्याय के नाम पर एक अनोखी सरकार आने पर वही जीरादेई जाना जाने लगा एक कुख्यात अपराधी के विधायक बनने से। नाम था मोहम्मद शहाबुद्दीन, सन 90 और 95 में राजेंद्र बाबू के जीरादेई का विधायक यही मो० शहाबुद्दीन रहा। इन्हें लोग 'साहेब' के नाम से भी बुलाते थे। चूंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री लालूजी का सीधा संरक्षण भी प्राप्त था, इसलिए एकदम अंगारचन्द मोड में रहते थे और समय समय पर ऐसे कारनामों को अंजाम देते रहते थे कि समूचा जिला त्राहिमाम कर उठता था।

लेकिन समय का सिद्धांत शहाबुद्दीन पर भी लागू हुआ और वक्त ने एक बार फिर करवट ली, बिहार में बदलाव की दस्तक हुई, नीतीश कुमार सत्ता में आये। राजद को बिहार की राजनीति से उखाड़ फेंका और शहाबुद्दीन पे भी शिकंजा कस गया। एक के बाद एक फाइलें खुलने लगी, बिहार पुलिस की स्पेशल टीम ने शहाबुद्दीन को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी था कि प्रतापपुर में उसके घर से छापेमारी के दौरान सेना के नाईट विज़न डिवाइस और पाकिस्तान में बने हुए हथियार भी मिले थे। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि शहाबुद्दीन के पाकिस्तान में अच्छे संपर्क थे। कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई और वर्ष 2009 में उसके चुनाव लड़ने पे भी रोक लगा दी।

इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भले ही शहाबुद्दीन या उनकी पत्नी हिना शहाब को राजद ने नहीं उतारा है, पर उनके नाम पर प्रचार जरूर हो रहा है। राजद के आधिकारिक हैंडल से 'शहाबुद्दीन जिंदाबाद' करती इस हरे रंग की बुलेट को बिहार के मनोमस्तिष्क का प्रतीक बताया गया है।



मुझे यह तो नहीं पता कि समूचे बिहार के मनोमस्तिष्क में अभी चल क्या रहा है परन्तु मुझे इतना जरुर पता है कि शहाबुद्दीन के कुकर्मों की दास्तान सुनकर किसी का भी दिल दहल उठेगा, शहाबुद्दीन कोई नेता नहीं है बल्कि सजायाफ्ता अपराधी है और अपराध एक दो हो तो शायद माफ़ी की गुंजाईश भी हो जाती है, लेकिन शहाबुद्दीन पर तो एक-दो नहीं सैकड़ों किताबें लिखी जा सकतीं हैं, बिहार की बदहाली को समझने के लिए शहाबुद्दीन को समझना अत्यंत आवश्यक है और इसलिए आइये डालते हैं उसके कारनामों पर एक नजर -

साल 1996 में शहाबुद्दीन राजद के टिकट पर सिवान के सांसद बने। वर्तमान में बिहार के कार्यवाहक डीजीपी सिंघल साहब उस समय सिवान के एसपी हुआ करते थे, एक शाम उनका काफिला शहर में घूम रहा था, तभी उनपर एक गाड़ी से ताबड़तोड़ फायरिंग होने लगी, एसपी साहब की एफआईआर के हिसाब से ये फायरिंग स्वयं शहाबुद्दीन और उनके अंगरक्षक कर रहे थे। मुकदमा भी लंबा चला, पर अंत में बंद हो गया।

फिर आया साल 1998, कॉमरेड कन्हैया कुमार से कई गुना क्रांतिकारी जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष थे चंद्रशेखर यानी 'चंदू'। अभी भाकपा माले राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन में लड़ रही है, इसी भाकपा माले के लिए चंदू सिवान में प्रचार अभियान कर रहे थे। बीच चौक पर चंदू और उनके कॉमरेड को गोलियों से भून दिया गया। विरोध के नामपर खूब बवाल हुआ। चंद्रशेखर की मां कौशल्या देवी को भी इस्तेमाल किया गया शहाबुद्दीन का विरोध करने के लिए।

chandrashekhar_urf_chandu फाईल चित्र : जे एन यु छात्र संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर उर्फ़ चंदू

बाद में भाकपा माले के दफ्तर पर भी हमला हुआ था और बलभर कूटे गए थे जिला सचिव केशव बैठा, बम फटने से छर्रे भी घुसे थे उनके शरीर में। सीपीआई (एम एल) यानी भाकपा माले के, और भी कार्यकर्ता उठाये गये और गायब हुए, जैसे बेचारे व्यापारी छोटेलाल गुप्ता और मुन्ना चौधरी, जो कभी नहीं मिल पाए।

साल 2001 में राजद के जिलाध्यक्ष मनोज जी को गिरफ्तार करने पुलिस पहुंची तो सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन जी स्वयं पहुंचकर एसडीपीओ साहब को ही झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिए और फिर मनोज जी को लेकर मौके से आगे रवाना हो गए थे। फिर हुआ प्रतापपुर गोलीकांड। गोरखपुर पुलिस और सिवान पुलिस की जॉइंट टीम उन्हें गिरफ्तार करने हेतु उनके गांव पर छापा मारने पहुंची, और होने लगी ताबड़तोड़ गोलीबारी। पुलिस की 3 गाड़ियां उड़ाकर मोहम्मद शहाबुद्दीन भागने में सफल रहे। पुलिसवालों समेत 9 लोग मारे गए। इन्हें शहाबु-47 भी कहा जाता था, क्योंकि इनके पास बिहार पुलिस की थ्री नॉट थ्री और कारबाईन से भी ज़्यादा आधुनिक हथियार एके-47 हुआ करता था।

साल 2003 में बिहार डीजीपी डीपी ओझा ने एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें शहाबुद्दीन के तार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े बताए गए। लेकिन इसपर कार्रवाई करने के बदले लालू राबड़ी सरकार ने उन्हें ही डीजीपी पद से हटा दिया। ऐसी ही एक रिपोर्ट सीबीआई स्पेशल सेल के तत्कालीन डीआईजी और बाद में दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे नीरज कुमार के पास भी थी, लेकिन सांसद होने के कारण सीबीआई शहाबुद्दीन को गिरफ्तार नहीं कर पाई।


बिहार के एक बड़े इलाके खासकर सिवान में शहाबुद्दीन की सरकार चलती थी। डॉक्टरों और स्कूलों की फीस भी शहाबुद्दीन ही तय करते थे। बाबासाहब के बनाए संविधान वाली कोर्ट कचहरी की जगह 'सिवान वाले साहब' की अदालतें भी लगती थीं। लोग दुकानों में भगवान की तस्वीर के साथ-साथ उनकी तस्वीर को भी दिया-बाती दिखाते थे। चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू ने अपनी दुकान का फीता भी शहाबुद्दीन से ही कटवाया था। चंदा बाबू का अच्छा खासा परिवार था, जवान बेटे थे, नया-नया मकान बनवा रहे थे।

freedom_for_shahabuddin_is_my_death_sentence_13_09_2016 फाईल चित्र : अपने तीन बेटों के न्याय की राह देखता चंदा बाबु दम्पत्ति

साल 2004 - चन्दा बाबू की दुकान पर उनके बेटे सतीश और गिरीश से रंगदारी मांगी गयी, पैसे देने में आनाकानी होने पर मारपीट हुई, और फिर शहाबुद्दीन के लोग चन्दा बाबू के बेटे राजीव, सतीश और गिरीश को अगवा करके साहब के दरबार ले गए। राजीव भागने में सफल रहा लेकिन सतीश और गिरीश को एसिड से नहलाकर मार दिया गया। कई साल बाद, तीसरे भाई राजीव की भी हत्या हो गई। आज भी चंदा बाबू सिवान में ही रहते हैं। उसी मकान में। दुकानें भाड़े पर चलती हैं, उसी से इनका जीवनयापन होता है।

साल 2004 बिहार में चुनावी वर्ष था और शहाबुद्दीन के इस तेज़ाब काण्ड से प्रदेश की राजनीति गरमा गई, मजबूरन साहेब को जेल जाना पड़ा और साल 2004 में शहाबुद्दीन ने जेल के अंदर से ही चुनाव लड़ा, जदयू के ओमप्रकाश यादव ने इन्हें चुनाव में 2 लाख से ज्यादा वोट लाकर कड़ी टक्कर दी, तो चुनाव जीतने के बाद जदयू के 9 लोग मारे गए। ओम प्रकाश यादव पर भी हमला हुआ, खूब पीटा गया, बाद में जान बचाने के लिए उन्हें 8 सरकारी बॉडीगार्ड अलॉट किए गए थे।

खैर 2005 में बिहार की सरकार बदली तो मोहम्मद शहाबुद्दीन का भाग्य भी बदल चुका था। सिवान एसपी रत्न संजय द्वारा मारे गए छापे में शहाबुद्दीन के घर से भारी मात्रा में हथियार बरामद हुए, जिनमें से कुछ पर पाकिस्तान की सरकारी ऑर्डिनेंस फैक्ट्री की मुहर भी लगी थी और इसी तरह शहाबुद्दीन के पापों के हिसाब का समय आ गया, इनकी गिरफ्तारी हुई, जिन मुकदमों में फैसले लटके हुए थे, उनमें सजाओं का ऐलान होने लगा।

असंख्य अपराधों के बावजूद शहाबुद्दीन को राजद का साथ मिलता रहा। फिर शहाबुद्दीन की जगह पत्नी हिना शहाब का राजनीतिक पदार्पण हुआ। साल 2009 से हर लोकसभा चुनाव में सिवान से हिना शहाब ही राजद प्रत्याशी रहीं, पर कभी भी जनता से जीत नहीं पाईं।

aa-Cover-5v5bbkb23gimivc0lligisoan0-20190429015117.Medi.jpeg फाईल चित्र : तेजस्वी यादव , शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब के साथ

साल 2016 में इन्हीं ने हिन्दुस्तान अखबार के सिवान ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन की हत्या करवा दी, बिहार समेत देशभर के प्रेस जगत में बहुत बवाल मचा लेकिन सिवाय एक और मुकदमे के, शहाबु-47 जी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। अगले साल 2017 में शहाबुद्दीन थोड़े समय के लिए जमानत पर जेल से निकला जरूर, लेकिन कोर्ट के फैसले से जल्द ही बिहार से सीधा तिहाड़ जेल का निवासी बन गया।

लेकिन चाहे जो हो, राजद ने अपना भरोसा जताते हुए साल 2019 में फिर से हिना शहाब को ही चुनाव में उतारा और एक बार फिर करारी हार का स्वाद चखा।

इस बार फिर बिहार चुनाव में शहाबुद्दीन की धमक है, पोस्टरों पर उनकी तस्वीरें चिपकाई जा रही हैं। कुछ लोग उन्हें रॉबिनहुड भी मानते हैं, पर अधिकतर केवल जंगलराज का सिपाही। अब इसे झुठलाने को राजद के समर्थक चाहे जो कहें, मो० शहाबुद्दीन यानी शहाबु-47 का सच जानना है तो सिवान के लोगों से पूछिए।

जय बिहार ! ! !

(गौतम एक यायावर का छद्म नाम है, ये जन्मजात बिहारी हैं और समय-समय पर ऐसे विषयों पर लिखते रहते हैं)

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