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    क्या कृषि बिल पर हो रहा विरोध उचित है?

    नये कृषि बिल के विषय में किसानों और आमजनमानस के बीच बहुत ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 तथा आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक - 2020 चर्चा में बने हुए हैं। आइए इन विधेयकों के विषय में कुछ जरूरी बातों को जान लें। सही क्या और गलत क्या ? क्या किसानों का "तीन विधेयक" के विरुद्ध आंदोलन उचित है या नहीं ?

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    भीष्म और परशुराम के युद्ध पर होने वाला दुष्प्रचार देश को बाँटने का षड़यंत्र है|

    एक वर्ग ने भीष्म और परशुराम के युद्ध पर फिर से इस देश को जातिओं में बांटने का षड्यंत्र किया है| भीष्म-परशुराम युद्ध का ये विश्लेषण सिर्फ सत्य पर निहित है| जिसमें सभी तथ्य उद्योग पर्व के अन्तर्गत अंबोपख्यान पर्व में भीष्म और परशुराम युद्ध से हैं|

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    अश्वेत फ्लॉयड की मौत: हिंसा में जलता अमेरिका, बंकर में राष्ट्रपति

    इक्कीसवी सदी में नस्लवाद की ऐसी निर्मम घटना ने कोरोना संकट के मध्य में अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं| आधुनिक अमेरिका में ऐसी घटनाएँ अश्वेतों के समान अधिकारों पर आघात है, जिसे पाने के लिए सदियों तक अथक संघर्ष किया गया| पर क्या श्वेतों के जीवन का कोई महत्व नहीं? अमेरिका में हो रहे दंगे विदेशी नक्सलवाद का जीता जागता उदाहरण है|

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    ये कौन सी शिवसेना है, ये कौन सी मराठी अस्मिता है?

    कार्टूनिस्ट बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना ने तब सारी मर्यादाएँ लांघ दी, सारे सिद्धांत तोड़ दिए, जब एक कार्टून बनाने मात्र से गुंडे भेज कर एक पूर्व नेवी अफसर को मारा पिटा गया। किसने सोचा था कि हिन्दू ह्रदय सम्राट की शिवसेना के नाक के नीचे 3 साधुओं को पुलिस के सामने मौत के घाट उतार दिया जाएगा और सरकार 90 दिन के बाद चार्जशीट भी दायर नहीं करेगी। किसने सोचा था कि यही शिवसेना बॉलीवुड के ड्रग माफियाओं और कातिलों को बचाने के लिए पूरा सिस्टम झोंक देगी? शिवसेना मराठी अस्मिता को और कितना चोट करना चाहती है?

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    अनुबंधित रोजगार: सरकार की निजीकरण से कोरोना काल मे बेरोजगार हुए सैकड़ो युवक

    भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इ सी आई एल जैसी अर्ध सरकारी कंपनियाँ, कॉन्ट्रैक्ट रोजगार के नाम पर देश में युवा प्रतिभाओं की बलि दे रहीं हैं। इंजिनियरों को रोजगार देने के नाम पर लिया जाता है और उनका उपयोग होने के बाद उन्हें बेरोजगार कर बीच मझधार में छोड़ दिया जाता है।

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    अंग्रेजी के पीछे भागता वर्ग, क्या जानता है, देश की पहचान अंग्रेजी नहीं?

    हिंदी और संस्कृत ऐसी उन्नत भाषाएँ हैं, जिनका महत्व सिर्फ भारत में ही नही समझा जाता, जबकि विदेशी इस पर शोध करते हैं, इसके बारे जानने की कोशिश करते हैं। लेकिन अफसोस! भारत में अपनी ही भाषा महत्वहीन और मेहमान होकर रह गयी है और संस्कृत तो विलुप्तप्राय है।

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